पानीपत। आश्विन मास कृष्ण पक्ष की अमावस्या को समस्त पितरों की वापसी उनके गंतव्य को हो जाती है। ऐसा माना जाता है कि पितृगण सूर्य और चंद्रमा की रश्मियों के सहारे वापिस अपने लोक जाते हैं। ऐसे में उनके वंशजों के दीपक जलाने से पितरों को वापसी का रास्ता दिखाई देता है। इस बार अमावस्या के दिन गजच्छाया होगी।
पंडित प्रवीण शास्त्री ने बताया कि अमावस्या एक अक्टूबर रात्रि 9:39 बजे शुरू होगी। यह दो अक्टूबर रात्रि 12:18 बजे तक रहेगी। आश्विन मास की अमावस्या को सूर्य को चंद्रमा दोनों हस्त नक्षत्र में होते हैं। जिस कारण गजच्छाया योग बन रहा है। गजच्छाया योग करीब नौ वर्ष पहले आया था। उससे पहले यह करीब 38 साल पहले बना था। शास्त्रों के अनुसार इस योग में पितरों के निमित्त कार्य करने का कई गुना फल प्राप्त होता है।
इस दिन वेदपाठी व ब्राह्मण को भोजन और दान देने से पितृ की आत्मा तृत्प हो जाती है। ऐसे में पितर अपने संतन को सुख समृद्धि और परिवार में शांति का आशीर्वाद देते हैं। इस दिन अपने पूर्व व अज्ञात पितरों का भी श्राद्ध करते हैं। माना जाता है कि 15 दिन के श्राद्ध में पितर अपने लोक से इस धरती पर आते हैं। वे अपने संतान से अन्न, जल आदि पाते हैं। इसके बाद आश्विनी मास की अमावस्या के दिन वापस अपने स्थान पर जाते हैं। इस दिन अपने पितरों को भोजन और जल का तर्पण करना चाहिए। गाय को चारों, अन्न और पानी की सेवा करने से पुण्य की प्राप्ति होती है। पीपल के पेड़ में तीलांजलि देने से व्यक्ति का भाग्य चमक उठता है। घर के बाहर दीपक जलाने से पितर जाते समय प्रसन्नता जाहिर करते हैं और परिवार को आशीर्वाद देते हैं। इससे घर-परिवार में सुख-शांति प्रदान करते हैं। जिससे भाग्य में आने वाली बाधा दूर हो जाती हैं। ऐसे में पितरों को भोग लगा कर शाम के समय घर की दहलीज पर दीपक जरूर जलाना चाहिए। इसके साथ उनसे जाने-अनजाने में भूल-चूक होने पर क्षमा मांगनी चाहिए।