पानीपत/इसराना। फाग (रंगों की होली) का नाम आते ही हर किसी के जहन में नौल्था की डाट होली आ जाती है। आए भी क्यों नहीं? नौल्था की डाट होली के रंग ही ऐसे हैं। यहां फांग रंगों की डाट लगाकर मनाया जाता है। नौल्था में इस बार 991वीं होली मनाएंगे। इसके साथ डाहर गांव का फाग भी देखने वाला होता है। दोनों गांवों में कढ़ायों में रंगों को तैयार किया जाता है और इसके नीचे दीवार के साथ ग्रामीण एक दूसरे के सामने खड़े हो जाते हैं। इस दौरान रंग उन पर डाला जाता है। इस डाट को तोड़ने के लिए ग्रामीण मकानों की छत से नीचे भी कूद जाते हैं। ग्रामीणों की माने तो अंग्रेज भी नौल्था में डाट होली मनाने को रोक नहीं पाए थे। 1944 में यहां के लोगों ने अंग्रेजों को होली मनाने के आदेश देने के लिए मजबूर कर दिया था। यहां अब दूर-दूर से ग्रामीण फाग देखने और खेलने आते हैं।
नौल्था और डाहर गांवों में फाग को लेकर तैयारी पूरी कर ली हैं। डाहर गांव में बीच वाली चौपाल में रंगों की डाट लगाई जाएगी। इसके साथ ग्रामीण पूरे गांव में चक्कर लगाएंगे। नौल्था गांव में कई चौपालों में रंगों की डाट लगाई जाएगी। इससे पहले बाबा लाठेवाला की गोशाला से शोभायात्रा निकाली जाएगी। यह शोभायात्रा गांवों के चारों तरफ घूमेगी। इसमें बाबा लाठेवाला के साथ देवी-देवताओं की मूर्ति होंगी।
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बेटे के शव को पिचकारी मार खेली थी होली
ग्रामीण सत्यवान व चंद्र सिंह ने बताया कि गांव के घुम्मन जैलदार के बेटे सरदारा की फाग के दिन मौत हो गई थी। ग्रामीणों ने फाग उत्सव को रोक दिया था। घुम्मन जैलदार फाग उत्सव की परंपरा बनाए रखने के लिए आगे आए। उन्होंने अपने बेटे के शव पर पिचकारी से रंग भरकर मारा और ग्रामीणों के साथ फाग खेला। इसके बाद सरदारा के शव का संस्कार किया। अंग्रेजों ने 1944 में फाग पर रोक लगा दी थी। ग्रामीणों ने इसको लेकर संघर्ष किया। इसके सात दिन बाद अंग्रेजों ने फाग मनाने की अनुमति दी।
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यह होती है रंंगों की डाट
फाग से करीब एक सप्ताह सूखी डाट लगाई जाती है। इसमें ग्रामीण दो टीमों में बंट जाते हैं। दोनों टीमों के मुखिया दोनों हाथ ऊपर उठाकर चौपाल की दीवार के साथ आमने-सामने खड़े हो जाते हैं। उनके पीछे उनकी टीम के सदस्य खड़े हो जाते हैं। वे खूब जोर आजमाइश करते हैं। इसको तोड़ने के लिए ग्रामीण छतों से कूद जाते हैं। फाग के दिन इसी तरह डाट लगाकर चौपाल से रंग डाला जाता है। एक रिवाज भी है, अगर कोई फाग नहीं खेलना चाहता तो वह सफेद कपड़े पहनकर गांव में घूम सकता है। उस पर कोई रंग नहीं डालता।
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दिन में होली पूजन और रात को किया दहन
इसराना। नौल्था गांव में रविवार को बनियों वाले तालाब के पास होलिका दहन किया गया। महिलाओं ने पूरा दिन होलिका पूजन किया। वे धार्मिक गीत गाते हुए होलिका पूजन के लिए पहुंची। रात 11 बजे के बाद होलिका दहन किया गया।