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पानीपत: अंग्रेज जिला कलेक्टर के हाथ-पांव बांध नीचे फेंक मार दिया था बुलबुल ने

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पानीपत। आजादी के लिए अंग्रेजों के खिलाफ बगावत करने वाली पानीपत की बुलबुल को अंग्रेजी हुकूमत फांसी पर लटका दिया था। बुलबुल ने अपने कोठे पर आए अंग्रेज जिला कलेक्टर के हाथ पैर बांधकर सीढ़ियों ने नीचे फेंक दिया था। जिला कलेक्टर की मौत हो गई थी, जिसके बाद अंग्रेजी हुकूमत की अदालत ने बुलबुल को मौत की सजा सुनाई थी।
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वर्ष 1850 में लखनऊ के पुराने सिया मोहल्ले में पैदा हुई बुलबुल पिता मुमताज हसन की मौत के बाद अपनी मां और छोटी बहन गुरैया के साथ पानीपत में आकर रहने लगीं। बचपन में बुलबुल के परिवार ने अंग्रेजों के जुर्म सहे। बुलबुल की मां मुसलमानों को देह व्यापार में धकेल दिया गया। पानीपत में उनका कोठा था। इतिहासकार रमेश पुहाल के मुताबिक अंग्रेजों के जुर्म के कारण बुलबुल उनके विरोध में थी। नफरत करती थी। 1888 में करनाल के अंग्रेज जिला कलेक्टर पीटर स्मिथ जोहन कोठे पर जा पहुंचे। अंग्रेजों ने नफरत करने वाली बुलबुल ने कोठे पर मौजूद सभी लड़कियों को एक जगह पर एकत्रित दिया। कपड़े धोने वाली थानी और डंडों से कलेक्टर पर हमला कर दिया। उसके हाथ-पांव बांधकर सीढ़ियों से नीचे फेंक दिया। इसमें जिला कलेक्टर की मौत हो गई। पुलिस वहां पहुंची और बुलबुल को गिरफ्तार कर लिया।
इतिहासकार के मुताबिक अंग्रेज हुकूमत के सेशन जज विलियम हडसन ने बुलबुल को 10 मार्च 1889 को मौत सकी सजा सुनाई। बुलबुल को सजा सुनाने के लिए रविवार को अदालत लगाई गई। मौत की सजा सुनने के बाद भी बुलबुल के माथे पर शिकन नहीं आई। अंग्रेज सरकार ने 8 जून 1889 को पानीपत के संजय चौक पर, जहां वर्तमान में हैदराबादी हस्पताल है, बुलबुल को फांसी दे दी गई। बुलबुल के शव को ईदगाह कॉलोनी के पास अंग्रेजी पुलिस की सख्त पहरेदारी में दफ्न किया गया। इस जगह पर बुलबुल का कोठा था, वहां आज सराफा और सुभाष बाजार है। इसे पहले बुलबुल बाजार के नाम से जाना जाता था।
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