चंडीगढ़। पंजाब व हरियाणा में अनुसूचित जाति उप योजना को प्रभावी तरीके से लागू करवाने व इसके लिए मिलने वाली राशि लैप्स न हो यह सुनिश्चित करने की मांग वाली याचिका पंजाब-हरियाणा हाईकोर्ट ने सिरे से खारिज कर दी। कोर्ट ने कहा कि नीतिगत व पूंजीगत निर्णय लेना सरकार का काम है और जब तक इसमें मौलिक अधिकारों का हनन न हो अदालत का दखल देना ठीक नहीं है।
याचिका दाखिल करते हुए नोएडा की रितु सिंह ने बताया कि केंद्र सरकार ने अनुसूचित जाति उपयोजना, इसके दिशानिर्देश व नीति को हरियाणा व पंजाब में प्रभावी तरीके से लागू नहीं किया जा रहा है। याची ने हाईकोर्ट से अपील की थी कि राज्य सरकार को इसके लिए उचित फंड उपलब्ध करवाने का आदेश दिया जाए। साथ ही यह भी सुनिश्चित किया जाए कि जो फंड मिला है वह बिना इस्तेमाल के लैप्स न हो जाए।
हाईकोर्ट ने याचिकाकर्ता का पक्ष सुनने के बाद कहा कि राज्य के लिए क्या बेहतर है यह निर्णय लेना सरकार का कार्य है। सरकार अपने बजट में किसको क्या देगी यह नीतिगत निर्णय है जिसमें न्यायालय के दखल की जरूरत नहीं है। कोर्ट ने कहा कि इस प्रकार के निर्णय विशेषज्ञों द्वारा विभिन्न पहलुओं पर विचार करने के बाद लिए जाते हैं। अदालतें इस विषय में एक्सपर्ट नहीं हैं और वैसे में यह कार्य विधायिका का है। कोर्ट ने कहा कि नीतिगत निर्णय में अदालत के दखल की संभावना बेहद कम होती है। जब तक संविधान के दिए गए अधिकारों का हनन न हो अदालतों को इस प्रकार के दखल से बचना चाहिए। इन टिप्पणियों के साथ ही हाईकोर्ट ने याचिका को खारिज कर दिया। हालांकि कोर्ट ने उसे सरकार को मांगपत्र देने की छूट दी है।