माई सिटी रिपोर्टर
पंचकूला। बच्चों पर माता-पिता अपने सपने न थोपें, उन्हें उनके ख्वाब पूरे करने दें। हम अपने बच्चों को रैट रेस में दौड़ा रहे हैं, नंबर गेम बंद होनी चाहिए। परीक्षा में बैठने वाले बच्चों पर सबसे अधिक मार्क्स लाने का दबाव न बनाएं। उनके साथ दोस्ताना रवैया अपनाएं। उन्हें अपने ढंग से पढ़ने और आगे बढ़ने दें। यह बातें सेक्टर-1 पीजी कॉलेज की वुमन सेल में शामिल महिला शिक्षकों व विद्यार्थियों ने कहीं।
मौका था अमर उजाला फाउंडेशन की ओर से ‘बोर्ड परीक्षा के तनाव से बच्चों को कैसे बचाएं’ विषय पर अपराजिता कार्यक्रम का। इस दौरान छात्राओं और महिला प्रोफेसर्स ने खुलकर अपने विचार रखे। कॉलेज की एसोसिएट प्रोफेसर हरप्रीत कौर ने कहा कि परीक्षा तो बस एक पड़ाव है। विद्यार्थी इसे जीवन और मौत का प्रश्न न बनाएं। माता-पिता बच्चों नंबर गेम में न डालें। एजुकेशन सिस्टम में भी सुधार की जरूरत है क्योंकि हमारी शिक्षा व्यवस्था केवल अकादमिक उपलब्धियों पर आधारित है। इससे बच्चों का सर्वांगीण विकास नहीं हो रहा।
हमें अकादमिक उपलब्धियों के साथ खेल समेत दूसरी गतिविधियों को भी उतना ही महत्व देना होगा। स्कूल स्तर पर ही इस धारणा को बदलना होगा कि बच्चों को केवल इंजीनियरिंग या डॉक्टर ही बनना है। उन्होंने सवाल उठाते हुए कहा कि क्यों कोई अभिभावक अपने बच्चों से यह नहीं कहता कि तुम्हें आर्ट्स पसंद है तो आर्ट ही पढ़ो। हर कोई अपने बच्चे को डॉक्टर या इजीनियर बनाने में लगा है। यह सोच बदलनी होगी।
अर्थशास्त्र की प्रोफेसर दविंदर कौर ने कहा कि विद्यार्थियों को योजनाबद्ध तरीके से पढ़ाई करनी चाहिए। तनाव किसी भी समस्या का हल नहीं। बच्चों को चाहिए कि स्कूल से पढ़कर आने के बाद उसका साथ के साथ रिवीजन कर लें। अगर बच्चे पूरे साल मन लगाकर पढ़ेंगे तो परीक्षा के समय कोई तनाव नहीं होगा। अभिभावकों को भी बच्चों के साथ दोस्ताना व्यवहार करना चाहिए। उन्हें टारगेट नहीं देना चाहिए कि इतने प्रतिशत नंबर लाना ही लाना है। बच्चे को नंबर मशीन बनाने की जगह हमें बेहतर नागरिक, बेहतर इंसान बनाने पर फोकस करना चाहिए। माता-पिता उन पर अपने सपने न थोपें, यह देखें कि बच्चा किस क्षेत्र में जाना चाहता है, उसे उसके सपने पूरे करने दें। कोचिंग सेंटरों के चक्कर में बच्चों पर पढ़ाई का दबाव बढ़ गया है। हर कोई अपने बच्चों को कोचिंग संस्थान में भेज रहा है, जो बिल्कुल गलत है। इन संस्थानों में बेवजह का दबाव बनाया जाता है, जिससे बच्चे तनाव में आ जाते हैं।
डॉ. अर्चना ने कहा कि विद्यार्थी अपना कंपीटीशन खुद से रखें। अपना सौ प्रतिशत देकर पढ़ाई करें और तनाव से दूर रहने के लिए एक्स्ट्रा करिकुलम एक्टिविटिज में हिस्सा लें। फेल होने से डरने के बजाय आत्मविश्वास से परीक्षा दें। अभिभावक भी उनका सपोर्ट करें। प्रोफेसर पूनम गिल ने कहा कि सरकार को इंजीनियरिंग और मेडिकल कॉलेजों की सीटें बढ़ानी चाहिए। सरकारी कॉलेजों में सीटें कम हैं। इसका फायदा प्राइवेट कॉलेज उठा रहे हैं। प्राइवेट कॉलेजों की फीस लाखों में है। इससे बच्चे और अभिभावक दोनों पर दबाव रहता है। सीटें बढ़ेंगी तो कंपीटीशन कम होगा। कंपीटीशन कम होगा तो बच्चों का तनाव भी कम होगा। पूजा ने कहा कि अभिभावकों को जागरूक होना पड़ेगा तभी बच्चे इस तनाव से दूर रहेंगे। कार्यक्रम में कॉलेज की वाइस प्रिंसिपल डॉ.अपराजिता, प्रोफेसर देविंदर कौर, पूजा, अंजू जिंदल, एसोसिएटर प्रोफेसर हरप्रीत कौर, पूनम गिल, डॉ. अर्चना, डॉ. सीमा, नीलम रोहिला, असिस्टेंट प्रोफेसर कुसुम, किरन, छात्रा भावना और रेनू उपस्थित रहीं।
स्कूल स्तर पर होनी चाहिए बच्चों की काउंसलिंग
बच्चों और पैरेंट्स की काउंसलिंग स्कूल स्तर पर होनी चाहिए ताकि बच्चों का तनाव कम किया जा सके। कुछ स्कूलों ने इसकी शुरुआत की है। बाकी स्कूलों को भी आगे आना चाहिए। अभिभावकों को भी बच्चों पर सबसे अधिक नंबर लाने का दबाव नहीं बनाना चाहिए। अभिभावक बच्चों को बेहतर माहौल देंगे तो बच्चे परीक्षा में अच्छा प्रदर्शन करेंगे।
-डॉ. अपराजिता, इंचार्ज, महिला प्रकोष्ठ पीजी कॉलेज
बच्चों पर भरोसा करना बेहद जरूरी
परीक्षा के दिनों में बच्चों के साथ अभिभावकों का अच्छा व्यवहार बहुत मायने रखता है। अगर हम बच्चों को कंफर्टेबल महसूस कराएंगे तो परीक्षा में वह अपना शत-प्रतिशत देंगे। जब हम बच्चों पर भरोसा नहीं करते तो वह डर जाते हैं। बच्चों को योजनाबद्ध तरीके से पढ़ने के लिए प्रेरित करें। उन्हें पढ़ाई के प्रति ईमानदार बनने के लिए प्रेरित करें। अगर बच्चा मन लगाकर दो घंटे भी पढ़ाई कर रहा है तो वह कामयाब होगा और अगर बेमन से छह घंटे भी बैठेगा तो उसका कुछ फायदा नहीं मिलेगा।
-डॉ. सीमा
फेल होने का यह मतलब नहीं कि जिंदगी खत्म हो गई। इंसान अपनी असफलता से ही सीखता है। हमें अपने बच्चों को प्रेरित करना चाहिए। उन्हें कोचिंग संस्थानों के जाल में न फंसाएं। सिलेबस को लेकर भी सरकार को सोचना चाहिए। अगर बच्चा अर्द्धवार्षिक परीक्षा में आधे सिलेबस की परीक्षा दे चुका है तो वार्षिक परीक्षा में बाकी के आधे सिलेबस के ही सवाल क्यों नहीं पूछे जाते। बच्चे को दोबार पूरा सिलेबस पढ़ना पड़ता है, जो एक तरह से बोझ बढ़ाता है। कोरोना काल में भी ऐसा हुआ था। इस पर विचार होना चाहिए। इससे बच्चों का तनाव कम होगा।
-अंजू जिंदल