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डिस्टेंस एजुकेशन से इंजीनियरिंग को स्वीकार की तो नागरिकों की कीमती जान पड़ सकती है खतरे में

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चंडीगढ़। पंजाब-हरियाणा हाईकोर्ट ने बेहद अहम फैसला सुनाते हुए डिस्टेंस एजुकेशन के माध्यम से ली गई इंजीनियरिंग की डिग्री को प्रमोशन के लिए अमान्य करार दे दिया। कोर्ट ने कहा कि यदि इसे स्वीकार किया गया तो देश के नागरिकों की कीमती जान और सरकारी खजाना खतरे में पड़ जाएगा।
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हिसार निवासी नरेश कुमार व अन्य ने हाईकोर्ट में याचिका दाखिल करते हुए पीडब्ल्यूडी में अन्य कर्मचारी को कार्यकारी अभियंता बनाने को चुनौती दी थी। याची ने कहा था कि जिस कर्मचारी को पदोन्नत किया जा रहा है उसने अपनी इंजीनियरिंग डिस्टेंस एजुकेशन के माध्यम से पूरी की थी। ऐसे में वह पदोन्नति का हकदार नहीं है क्योंकि डिस्टेंस एजुकेशन से इंजीनियरिंग को स्वीकार नहीं किया जा सकता। याचिका का विरोध करते हुए पदोन्नत हुए कर्मी ने कहा कि वह पदोन्नति पाकर अब रिटायर भी हो चुका है ऐसे में उसको मिलने वाले लाभ में कटौती न की जाए।
हाईकोर्ट ने सभी पक्षों को सुनने के बाद अपना फैसला सुनाते हुए कहा कि डिस्टेंस एजुकेशन के माध्यम से की गई इंजीनियरिंग के आधार पर पदोन्नति का लाभ नहीं दिया जा सकता। कोर्ट ने कहा कि जो व्यक्ति कक्षाओं में मौजूद नहीं रहा और व्यावहारिक प्रशिक्षण नहीं लिया उसे इंजीनियर कहा ही नहीं जा सकता है। इंजीनियरों का काम बेहद अहम है क्योंकि वह देश के बुनियादी ढांचे के निर्माण में शामिल होता है। किसी भी प्रकार की गलती देश के नागरिकों के कीमती जीवन व सरकारी खजाने को खतरे में डाल सकती है।
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कोर्ट ने कहा कि डिस्टेंस एजुकेशन से ली गई इंजीनियरिंग की डिग्री और नियमित की गई इंजीनियरिंग को एक समान नहीं माना जा सकता है। यदि डिस्टेंस एजुकेशन की इंजीनियरिंग को मंजूरी दी गई तो वह दिन दूर नहीं जब लोग डिस्टेंट एजुकेशन से एमबीबीएस की डिग्री लाने लगेंगे। कोर्ट ने कहा कि क्या कोई ऐसे डॉक्टर से इलाज करवाना चाहेगा जिसने डिस्टेंस से एमबीबीएस की हो।
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