पंचकूला में एक कार्यक्रम में बतौर मुख्यातिथि पहुंची आईएएस सुमेधा कटारिया ने अपना दर्द बयां किया तो हर सुनने वाले की आंख भर आई। समेधा बताती हैं कि मेरी उम्र 55 की हो चली है, लेकिन जिंदगी के इस सफर में हर उपलब्धि पर समाज से प्रोत्साहन की जगह ताने सुनने को मिलते थे। परिवार की आर्थिक कमजोर स्थिति को मां और सात बहनों ने कभी आड़े नहीं आने दिया। परिणाम भी सार्थक आए। मैंने शिक्षिका से हरियाणा की पहली महिला बीडीपीओ का पदभार संभाला। मेहनत के दम पर एचसीएस और फिर आईएएस के पद पर पहुंची।
लेकिन प्रोत्साहन के स्थान पर कानों तक बरबस हर बार एक ही बात पहुंची ‘के होग्या औरत थी बणगी।’ पंचकूला स्थित हरियाणा साहित्य अकादमी में आयोजित प्रदेश स्तरीय महिला रचनाकार सम्मेलन मे बतौर मुख्य अतिथि शिरकत करने पहुंची आईएएस अधिकारी सुमेधा कटारिया ने अपनी उपलब्धि तो बताई, साथ ही उन्होंने समाज में मिलने वाले ताने का भी जिक्र किया। पंजाब अबोहर में जन्मी सुमेधा कटारिया अपने परिवार में सात बहनों में छठे स्थान पर हैं। सभी बहनों में से दो आईएएस बन चुकी हैं।
वह कहती हैं कि महिलाओं को किसी भी किरदार में पुरुष प्रधान समाज कम आंकें ये गलत है। उन्होंने बताया कि 1946 में उनकी माता शकुंतला कटारिया ने शादी के बाद हॉस्टल में रहकर मैट्रिक की। हालांकि परिवार की आर्थिक हालत ऐसी थी कि वह चाहकर भी आगे पढ़ाई नहीं कर सकीं। लेकिन सातों बेटियों को उन्होंने सुशिक्षित करने में जो भूमिका निभाई वो एक प्रखर महिला के संघर्ष के बूते ही संभव है। वरना उन्होंने अपने घर में वह अभाव भी देखा कि आटे का ‘पीपा’ भी खाली होता था। उल्लेखनीय है कि करीब छह साल पहले सुमेधा कटारिया और उनकी बहनें तब सुर्खियों में आई थीं जब उन्होंने पुत्र बनकर अपनी मां की अंतिम यात्रा में कंधा देने के साथ अंतिम संस्कार किया था। उनकी कई पुस्तकें प्रकाशित हो चुकी हैं।
गाय मरे अभागे की, बेटी मरे सौभागे...
महिला को उपेक्षित करार देती उन कहावतों का अपनी रचना के दौरान डॉ. रेणुका ने जिक्र किया। उन्होंने कहा कि आज महिलाओं के लिए सशक्तिकरण की बात होती है। लेकिन इसी समाज में यह कहावत इन प्रयासों की पोल खोलती है। उन्होंने बकायदा राज्य के नाम का उल्लेख करते हुए कहा कि यहां आज भी कहा जाता है, गाय मरे अभागे की, बेटी मरे सौभागे की।