संवाद न्यूज़ एजेंसी
बरवाला। आशा वर्कर्स के आंदोलन को कुचलने के लिए हरियाणा सरकार की ओर से लगातार दमन चक्र चलाया जा रहा है। सरकार इतनी तानाशाही पर उतर आई है कि आशा वर्कर्स को शांतिपूर्ण तरीके से इकट्ठा होकर अपनी बात तक नहीं रखने दे रही है। इससे नाराज होकर सर्व कर्मचारी संघ हरियाणा जिला पंचकूला के जिला प्रधान श्रवण कुमार जांगड़ा, जिला सचिव विजय पाल, संगठन सचिव रामपाल मलिक और सीटू जिला सचिव लक्ष्मी राम ने कहा कि अब सरकार की आशा वर्कर्स के साथ धक्केशाही को बर्दाश्त नहीं करेंगे। उन्होंने हरियाणा सरकार के इस रवैये की कड़ी आलोचना की।
कर्मचारी नेताओं ने कहा कि प्रदेश की 20 हजार आशा वर्कर्स अपनी मांगों को लेकर 8 अगस्त से हड़ताल पर हैं और शांतिपूर्ण तरीके से अपनी बात सरकार तक पहुंचाना चाहती हैं। लेकिन प्रदेश सरकार आंदोलनरत आशा वर्कर्स की मांगों का समाधान करने के बजाय दमन का रास्ता अपना रही हैं। जब भी आशा वर्कर्स शांतिपूर्ण तरीके से इकट्ठा होकर अपनी बात सरकार तक पहुंचाने की कोशिश करती हैं प्रदेश सरकार उन्हें पुलिस हिरासत में लेकर दूर दराज स्थानों पर छुड़वा देती है। शांतिपूर्ण इकट्ठा होकर अपनी बात रखने का अधिकार देश के संविधान ने सभी को दिया है। हरियाणा सरकार संवैधानिक अधिकारों को कुचलकर तानाशाही पर उतर आई है।
रविवार को पंचकूला जिला की आशा वर्कर्स विस अध्यक्ष ज्ञानचंद गुप्ता को मिलकर अपनी बात रखना चाहती थीं, लेकिन उनको सुनने के बजाय पुलिस ने उन्हें धमकाकर इकट्ठा भी नहीं होने दिया। पुलिस ने सीटू नेताओं से दुर्व्यवहार किया और बरवाला स्थित सीटू दफ्तर पर पुलिस का पहरा बैठा दिया। बेटी बचाओ, बेटी पढ़ाओ का खोखला नारा देने वाली सरकार का यह कदम पूरी तरह महिला विरोधी, लोकतंत्र विरोधी व संविधान विरोधी है। उन्होंने कहा कि हड़ताल पर जाने से पहले आशा वर्कर्स ने संबंधित अधिकारियों और सरकार को ज्ञापन देकर मांगों के हल के लिए कई बार गुहार लगाई है। सरकार की हठधर्मिता के कारण ही आशा वर्कर्स हड़ताल पर जाने के लिए मजबूर हुई हैं।
बता दें कि आशा वर्कर्स के काम के कारण ही 2005 से 2020 के बीच देश में माता और शिशु मृत्यु दर में भारी कमी आई है। यहीं नहीं कोरोना काल में आशा वर्कर्स ने अपनी जान जोखिम में डालकर कोरोना महामारी पर काबू पाने के लिए आगे आकर काम किया है। संयुक्त राष्ट्र संघ ने आशा वर्कर्स के इस काम की सरहाना की है और इन्हें सम्मानित भी किया गया है। महिला सशक्तीकरण की बात कहने वाली प्रदेश सरकार स्वयं महिलाओं पर अत्याचार व शोषण कर रही है।
पांच साल में आशा वर्करों के मानदेय में कोई बढ़ोतरी नहीं की गई है। इनिशिएटिव में ही 50 प्रतिशत की कटौती कर दी है। पहले ही आशा वर्कर्स को बहुत कम मानदेय मिल रहा है और ऊपर से अन्य कामों का बोझ डाला जा रहा है। आशा वर्कर्स को पक्का कर्मचारी बनाने व जब तक पक्का कर्मचारी नहीं बनाया जाता, तब तक न्यूनतम मासिक वेतन 26000 रुपए देने और अन्य मांगें पूरी तरह से उचित हैं। सर्व कर्मचारी संघ हरियाणा इनकी मांगों का पुरजोर समर्थन करता है और पुरी तरह से आंदोलन में आशा वर्कर्स के साथ है। सर्व कर्मचारी संघ हरियाणा सरकार से मांग करता है कि आशा वर्कर्स की मांगों का समाधान करे।