पराली की समस्या पर विचार करते पंजाब सरकार के मंत्री।
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पंजाब में पराली जलाने से होने वाली समस्या को देखते हुए सरकार के चार मंत्रियों ने मोर्चा संभाल लिया है। धान की पराली को जलाने से होते प्रदूषण से निजात पाने के लिए इससे जुड़े अलग-अलग विभागों और संबंधित विभागों के साथ मिलकर साझा रणनीति बनाई गई। इसके मद्देनजर सोमवार को पंजाब भवन चंडीगढ़ में कृषि मंत्री कुलदीप सिंह धालीवाल, उच्च शिक्षा और पर्यावरण मंत्री मीत हेयर, नवीन और नवीकरणीय ऊर्जा मंत्री अमन अरोड़ा और स्कूल शिक्षा मंत्री हरजोत बैंस, मुख्यमंत्री के अतिरिक्त मुख्य सचिव ए. वेनू प्रसाद और अतिरिक्त मुख्य सचिव कृषि सरवजीत सिंह ने विशेषज्ञों के साथ बैठक की।
कृषि मंत्री कुलदीप सिंह धालीवाल और उच्च शिक्षा मंत्री गुरमीत सिंह मीत हेयर ने बताया कि पंजाब सरकार 27 सितंबर को पंजाबी यूनिवर्सिटी पटियाला से किसानों को पराली न जलाने के प्रति जागरूक करने के लिए मेगा जागरूकता मुहिम शुरू करने जा रही है। इस मुहिम के पहले पड़ाव के अंतर्गत यूनिवर्सिटी और कॉलेजों के नौजवानों को पराली जलाने के दुष्प्रभावों और पराली को मिट्टी में ही मिलाने के फायदों के बारे जानकारी दी जाएगी। इसके बाद 28 सितंबर को पंजाब कृषि यूनिवर्सिटी लुधियाना और 29 को गुरु नानक देव यूनिवर्सिटी अमृतसर में ट्रेनिंग प्रोग्राम करवाए जाएंगे।
कृषि मंत्री ने बताया कि सब्सिडी पर हैपी सिडर लेने के लिए किसानों को आवेदन करने के लिए 15 दिन का समय बढ़ाया गया है, जिससे अधिक से अधिक किसान इस स्कीम के अधीन हैपी सिडर लेकर पराली को बिना जलाए गेहूं की बुवाई कर सकें। इसके अलावा पराली को मिट्टी में बिना जलाए मिश्रित करने के लिए कृषि विभाग की तरफ से पायलट प्रोजेक्ट के तौर पर 5,000 एकड़ में डी-कम्पोजर के घोल का छिड़काव किया जाएगा। ब्लॉक स्तर पर कृषि अफसरों को 5-10 हैपी सिडर मशीनें दीं गई हैं। ये मशीनें छोटे किसान मुफ्त में इस्तेमाल कर सकेंगे।
बैठक में ये रहे मौजूद
बैठक में किसान आयोग के अध्यक्ष डॉ. सुखपाल सिंह, पंजाब प्रदूषण रोकथाम बोर्ड के चेयरमैन प्रो. आदर्श पाल विग और सदस्य सचिव इंजीनियर करुनेश गर्ग, पंजाब कृषि यूनिवर्सिटी लुधियाना के वाइस चांसलर डॉ. एस एस गोसल, पंजाबी यूनिवर्सिटी पटियाला के वाइस चांसलर डॉ. अरविंद और गुरु नानक देव यूनिवर्सिटी अमृतसर के वाइस चांसलर जसपाल सिंह संधू, एडीजीपी लॉ एंड आर्डर अर्पित शुक्ला और कृषि विभाग के निदेशक गुरविंदर सिंह ने धान की पराली को बिना जलाए संभालने और ईंधन के तौर पर इस्तेमाल करने लिए विचार पेश किए।