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नियमों को धता बता नदियों से बडे स्तर पर हो रहा अवैध खनन, रेत, बजरी निकाल करोड़ों के राज्स्व का चूना लगा रहा माफिया

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रोजाना नदियों से निकल रहे अवैध खनन के सैकड़ों डंपर
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- मोरनी के नीमवाला, सिंगवाला, थापली सहित डांगरी नदी में धड़ल्ले से हो रहा अवैध खनन
- गोबिंदपुर क्षेत्र से गुजर रही डांगरी नदी में खनन माफिया पहले से भी ज्यादा है सक्रिय

अमर उजाला ब्यूरो
मोरनी। शिवालिक की तलहटी से निकलने वाली नदियों से खनन माफिया बडे़ स्तर पर अवैध खनन कर सरकार को करोड़ों रुपये की चपत लगाने का काम कर रहा है। माफिया इतना बेखौफ है कि दिन हो या रात सरेआम क्षेत्र की नदियों से अवैध खनन कर रहा है। वहीं, माइनिंग विभाग की कार्रवाई नदियों से रोजाना हो रहे अवैध खनन के लिहाज से नाकाफी साबित हो रही है, जिसकी उच्च जांच जरूरी है। धड़ल्ले से चल रही अवैध माइनिंग का ऐसा ही नजारा मोरनी के नीमवाला, सिंगवाला, थापली और सबसे अधिक मोरनी की तलहटी में बसे गोबिंदपुर गांव से निकलने वाली डांगरी नदी में भी हो रही है। इन नदियों में माइनिंग के नियमों को ताक पर रखकर अवैध माइनिंग की जा रही है। जिसे लेकर संबंधित विभाग के अधिकारी भी कोई सख्त कदम उठाने को तैयार नहीं है। वहीं इस अवैध खनन से अधिकारियों की मिलीभगत का अंदेशा भी लगाया जा सकता है। सूत्रों से मिली जानकारी के अनुसार मंगलवार को पुलिस के एक बडे़ अधिकारी ने भी गोबिंदपुर नदी व उसके आसपास के माइनिंग क्षेत्र का दौरा किया था।
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अवैध माइनिंग की यह हैं हालात
मोरनी व साथ लगते गोबिंदपुर क्षेत्र से गुजर रही डांगरी नदी में खनन माफिया पहले से भी ज्यादा सक्रिय हैं। दोनों ही जगहों पर खनन माफिया बेखौफ होकर नदियों से खनन करता हुआ सरेआम दिखाई दे रहा है। अवैध माइनिंग का ये खेल माइनिंग के कानूनी नियमों की आड़ में खेला जा रहा है। नियमों के मुताबिक खनन का ठेका लेने के बाद नदी में कुछ फुट तक ही खनन किया जा सकता है जबकि मौजूदा स्थिति में सैकड़ों फुट के आसपास खुदाई कर प्राकृतिक संसाधनों का हनन किया जा रहा है। वहीं खनन विभाग की कार्रवाई और कई मुकदमे दर्ज कराने के दावे भी खोखले साबित हो रहे हैं। क्योंकि खनन माफिया में न तो कार्रवाई का और न ही केस दर्ज होने का खौफ हैं। खनन माफिया की इस मनमर्जी का सबसे ज्यादा नुकसान किसानों को उठाना पड़ता है, क्योंकि अक्सर बारिश के दौरान नदियों में आए पानी के कारण कई बार किसानों की काफी फसल पानी में भीग जाती है और उन्हें आर्थिक तौर पर नुकसान उठाना पड़ता है। खनन माफिया ने अधिकारियों को चकमा देने के लिए सड़कों के रास्ते डंपरों को नहीं चलाया जाता। बल्कि नदियों के रास्ते कई किलोमीटर का सफर तय करके ग्रेवर को क्रशर जोन तक पहुंचाया जाता है।
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