सब्जी मंड़ी में लगे सब्जी के ढेर
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नोटबंदी के बाद हुई कैश की किल्लत से सबसे अधिक परेशानी किसानों व मजदूरों को झेलनी पड़ रही है। सुबह सवेरे सब्जी मंडियों में अपनी उपज को लेकर पहुंचे किसानों को जहां अपनी उपज के दाम नहीं मिल रहे हैं, तो बाजार में खरीददार ना होने से रेहड़ी मजदूर लाचार हैं।
नोटबंदी के बाद से बाजार में तो सब्जियों की कीमत से जस की तस हैं, लेकिन किसान की सब्जी को मंडी में खरीददार नहीं मिलते। नगदी की चाह में मजबूरी में किसान औने-पौने दामों में अपनी फसल को बेचने को मजबूर हैं। लेकिन आढ़ती द्वारा रेहड़ी मजदूर को सस्ती नहीं मिलती, जिसके चलते बाजार में कीमतों में कोई फर्क नहीं आया है।
सब्जी के धंधे से जुड़े लोगों के अनुसार मंडी में आढ़ती किसान की मजबूरी का फायदा उठा रहे हैं। किसान को खरीद करने की एवज में 1000-500 के नोट दिखाते हैं, जिसे लेकर किसान मजबूर हो जाते हैं। घंटों इंतजार के बाद किसान अपनी फसल को आढ़ती की मर्जी से आधे से भी कम कीमत में बेचने को मजबूर हो जाते हैं।
सुबह चार बजे माल लेकर मंडी में गया था। घंटों तक खरीददार नहीं मिला, तो टमाटर, गोभी व मटर को मिट्टी के भाव बेचकर आना पड़ा।
-राम सिंह, किसान
हमें तो उधारी सब्जी लेनी खरीदनी होती है। देखते हुए भी कि किसान के पास चौथाई भाव में मिल रही है, लेकिन आढ़ती से लेनी पड़ती है। बाजार में शाम तक खरीददार नहीं मिलते, जिसकी वजह से पैसे भी पूरे नहीं होते।
-पिंटू, रेहड़ी मजदूर