फोटो संख्या:76- सतनाली में आयोजित श्रीमद्भागवत कथा के दौरान श्रीकृष्ण सुदामा की झांकी निकालते आ
सतनाली। खंड सतनाली में भागवत कथा सप्ताह के दौरान दास मोहित कौशिक महाराज ने श्रीमद्भागवत कथा के सातवें दिन श्रीकृष्ण और सुदामा की मित्रता की कथा सुनाई।
उन्होंने कहा कि मित्र हमारे सुख-दुख के साथी होते हैं। किसी भी परिस्थिति में मित्र हमेशा साथ खड़े होते है। भारतीय परंपरा में मित्रता की बहुत सारी कहानियां प्रचलित हैं। इन्हीं में से एक कृष्ण और सुदामा की कहानी है। भारतीय परंपरा में मित्र का जीवन में बहुत बड़ा स्थान है। जीवन में माता पिता और गुरु के बाद मित्र को विशेष स्थान दिया गया है।
जब कभी मित्रता की बात होती है तो कृष्ण और सुदामा की मिसाल दी जाती है। श्रीकृष्ण बालपन में ऋषि संदीपन के यहां शिक्षा ग्रहण कर रहे थे तो उनकी मित्रता सुदामा से हुई थी। कृष्ण एक राज परिवार में और सुदामा ब्राह्मण परिवार में पैदा हुए थे, लेकिन दोनों की मित्रता का गुणगान पूरी दुनिया करती है। शिक्षा-दीक्षा समाप्त होने के बाद भगवान कृष्ण राजा बन गए वहीं दूसरी तरफ सुदामा के बुरे दौर की शुरुआत हो चुकी थी। बुरे दिन से परेशान होकर सुदामा की पत्नी ने उन्हें राजा कृष्ण से मिलने जाने के लिए कहा। पत्नी की जिद को मानकर सुदामा अपने बाल सखा कृष्ण से मिलने द्वारका गए। जब राजा कृष्ण अपने मित्र सुदामा के आने का संदेश पाकर कृष्ण नंगे पैर ही उन्हें लेने के लिए दौड़ पड़ते हैं। मित्र सुदामा की दयनीय हालत देखकर भगवान कृष्ण के आंसू थमने का नाम नहीं ले रहे थे। भगवान कृष्ण ने मित्र सुदामा का पैर अपने आंसुओं से धूल दिया। यह घटना भगवान कृष्ण का अपने मित्र सुदामा के प्रति अनन्य प्रेम को दर्शाता है।
फोटो संख्या:76- सतनाली में आयोजित श्रीमद्भागवत कथा के दौरान श्रीकृष्ण सुदामा की झांकी निकालते आ