कुरुक्षेत्र। धर्म नगरी में सन्निहित सरोवर स्थित मां भद्रकाली काली कमली मंदिर अब प्रदेश ही नहीं बल्कि देशभर में आस्था का केंद्र बनने लगा है। इस मंदिर में मन्नत पूरी होने पर नारियल और चुनरी चढ़ाने की परंपरा काफी पुरानी है। सन 1880 में इस मंदिर की स्थापना स्वामी विशुद्धानंद महाराज बाबा काली कमली वाले ने की थी, वे कोलकाता से मां के चंडी स्वरूप को लेकर धर्मनगरी पहुंचे थे, जो कि इस मंदिर में स्थापित की गई है।
मंदिर के प्राचीन होने के प्रमाण मंदिर की दीवारों और छत पर बनी सैकड़ों साल पुरानी अद्भुत वास्तुकला को देखकर मिलते हैं। इस वास्तुकला को देखकर ऐसा प्रतीत होता है, जैसे कि आज ही दीवारों पर कलाकृतियों को उकेरा गया हो। इसके अलावा मंदिर में मां भद्रकाली की चरण पादुकाएं भी स्थापित की गई हैं, जबकि मंदिर के साथ ही पांडवों का मंदिर बना हुआ है, जिसे गीता मंदिर के नाम से जाना जाता है।
यह मंदिर धार्मिक संस्था काली कमली के अधीन है, जिसका मुख्यालय कोलकाता में स्थित है और कुरुक्षेत्र, हरिद्वार, ऋषिकेश में इस संस्था के आश्रम भी बने हुए है। धार्मिक संस्था काली कमली होने के चलते इस मंदिर को मां भद्रकाली काली कमली के नाम से जाना जाता है।
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मां को नारियल व चुनरी चढ़ाने की परंपरा : उनियाल
पुजारी ज्योति प्रकाश उनियाल ने बताया कि मंदिर में प्रदेश ही नहीं बल्कि विदेशों से श्रद्धालु मां के दर्शन करने के लिए मंदिर में पहुंचते हैं। इस मंदिर में परंपरा है कि मन्नत पूरी होने पर मां को नारियल और चुनरी चढ़ाई जाती है। शास्त्रों के अनुसार नवरात्र में मां के नौ स्वरूपों की पूजा होती है। इस दौरान मां की आराधना करने से जहां घर में सुख शांति रहती है तो वही लोगों को रोजगार भी उपलब्ध होता है। इसके अलावा महिलाओं को पुत्र की प्राप्ति भी मां की कृपा से होती है।