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Kurukshetra News: रेलवे स्टेशन के साथ ट्रेनों में भी था पुलिस का पहरा, चकमा देकर पहुंचे थे लखनऊ

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कुरुक्षेत्र। श्रीराम जन्म भूमि आंदोलन का असर अयोध्या ही नहीं पूरे देश भर में फैल चुका था। तत्कालीन उत्तर प्रदेश सरकार ने आंदोलन को रोकने के लिए हर संभव प्रयास किए। यहां तक कि दूसरे प्रदेशाें के लोग उत्तर प्रदेश में प्रवेश न कर सके, इसके लिए आसपास के रेलवे स्टेशनों पर ही नहीं, ट्रेनों में भी पुलिस का पहरा था। ट्रेनों में खुफिया कर्मी अयोध्या जाने वाले लोगों की पहचान के लिए जय श्री राम का नारा लगाते थे। उत्तर प्रदेश के बार्डर सील थे तो चप्पे-चप्पे पर जवान तैनात थे। ऐसे में अयोध्या जाना ही किसी बड़े आंदोलन से कम नहीं था,लेकिन देश भर के साथ-साथ धर्मनगरी के कारसेवकों के जज्बे व जुनून को ये सभी प्रबंध कम नहीं कर पाए।
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आंदोलन की ये यादें ताजा करते हुए विश्व हिंदू परिषद धर्म प्रसार विभाग के प्रांत संरक्षक सुरेश जोशी बताते हैं कि वर्ष 1990 में पहले ही जत्थे में धर्मनगरी से 150 से ज्यादा लोग अयोध्या आंदोलन में शामिल होने के लिए रवाना हुए थे। वे भी इस जत्थे में शामिल थे तो उनकी पत्नी के साथ करीब 25 महिलाएं भी थीं। पुलिस को चकमा देने के लिए कारसेवक अंबाला से ट्रेन में सवार हुए तो टिकट भी कानपुर का लिया, ताकि टिकट के जरिए भी पुलिस व खुफिया कर्मी उनके इरादे ने भांप सके। कानपुर जाने के बाद ट्रेन रुकी तो वहां से लखनऊ का टिकट लिया, लेकिन लखनऊ स्टेशन पर बाहर निकलते ही पुलिस ने हिरासत में ले लिया और उन्हें जेल-जेल घुमाते रहे। जब जगह नहीं मिली तो उन्नाव के शिक्षण संस्थान में बनाई अस्थायी जेल में रखा गया। इस दौरान भी जत्थे में शामिल कृष्ण बजाज, यशपाल वधवा, मुरारी लाल, अशोक जाडू व सुभाष चंद सहित 25 से ज्यादा लोग पुलिस को चकमा देकर अयोध्या तक पहुंचने में कामयाब रहे थे।

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150 किलोमीटर तक पैदल चले लोग
सुरेश जोशी बताते हैं कि जुनून क्या होता है, यह उस आंदोलन के दौरान ही देखने को मिला। जब उत्तर प्रदेश के सभी बार्डर सील कर दिए गए, वाहन रोक दिए गए और जगह-जगह हथियारों के साथ जवानों का पहरा लगा दिया गया, लेकिन लोग रुके नहीं। 150-150 किलोमीटर तक पैदल भी चले और जान की परवाह तक नहीं की। पहले 30 अक्तूबर तो फिर दो नवंबर को गोलियां चलीं, फिर भी लोगों का जुनून कम नहीं हुआ। सख्ती के चलते आंदोलन और ज्यादा बढ़ता गया।
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दिल्ली में पहुंच गए थे 25 लाख लोग
अक्षत वितरण अभियान में नगर प्रभारी सुरेश जोशी बताते हैं कि पहले 1990 में आंदोलन हुआ, जो सरकार के कड़े प्रयासों के बावजूद कमजोर नहीं पड़ा। इसके बाद 1992 के आंदोलन की तैयारियां शुरू हो गई। इसी कड़ी में चार अप्रैल 1991 में दिल्ली के वोट क्लब में रैली हुई, जिसमें देश भर से करीब 25 लाख लोग शामिल हुए। इतनी बड़ी रैली आज तक नहीं हो पाई। यहां तक कि वोट क्लब में रैली करने पर ही पाबंदी लगा दी गई, जो आज भी जारी है। इसके बाद छह दिसंबर 1992 को ढांचा ढहाया गया।


आंदोलन से लौट कर मनाई थी शादी की पहली वर्षगांठ : भूदेव
कारसेवक भूदेव सिंह बताते हैं कि 1990 में गए जत्थे में महिलाएं भी शामिल रहीं। वे भी शादी के कुछ माह बाद ही आंदोलनकारी जत्थे में शामिल होकर गए थे। वहां उन्नाव जेल में रहने के बाद जब वापस लौटे तो यहां आने पर शादी की पहली वर्षगांठ मनाई थी। वहीं सुरेश जोशी भी बताते हैं कि उनकी शादी को भी कुछ माह हुए थे और उनके साथ आंदोलन में धर्मपत्नी सुमनलता भी रही थीं। वापस लौटने पर ही पहली वर्षगांठ मनाई थी। यहां लौटने पर नवंबर 1990 में श्रीकृष्णा धाम की ओर से स्वागत समारोह का आयोजन किया गया था, जिसमें कारसेवकों को सम्मानित किया गया था।
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