कुरुक्षेत्र। कुवि के संस्कृत एवं प्राच्य विद्या संस्थान व संस्कृत पालि एवं प्राकृत विभाग के सहयोग से मातृभाषा एवं स्वाभिमान विषय पर विचार गोष्ठी का आयोजन किया गया, जिसमें मातृभाषा के मानव जीवन में महत्व व स्वाभिमान को लेकर विचार साझा किए गए। मुख्य वक्ता पूर्व विभागाध्यक्ष प्रो. ललित कुमार गौड़ ने संस्कृत को समस्त भारतीय भाषाओं की जननी बताया और कहा कि संस्कृत भाषा का अध्ययन गौरव का विषय है। संस्कृत संपूर्ण विश्व की एकता के लिए अनिवार्य भाषा है। भारत देश में भाषागत विवादों का समाधान भी संस्कृत ही है। संपूर्ण देश के किसी भी भाग में संस्कृत के प्रति विरोध नहीं है। दुनिया की किसी भी भाषा में रचे गए साहित्य में संस्कृत साहित्य से ही भाव भाषांतरित किए गए हैं।
विभागाध्यक्ष प्रो. कृष्णा देवी ने कहा कि भारत की प्रत्येक भाषा व बोलियों में संस्कृत के शब्द विद्यमान है और हरियाणवी बोली में भी संस्कृत के अनेक शब्द है। इसीलिए संस्कृत के लिए भारत की अन्य भाषाओं को समझना आसान हो जाता है। इस दौरान संस्कृत एवं प्राच्य विद्या संस्थान के विद्यार्थियों द्वारा किए गए क्रियात्मक अनुसंधान के अंतर्गत की गई गतिविधि की रिपोर्ट प्रस्तुत की गई। गतिविधि के अंतर्गत शोध छात्रा कुसुम, अंजलि सहित अन्य छात्रों के द्वारा मातृभाषा व देवनागरी लिपि में छात्रों के हस्ताक्षर का प्रतिशत जानने हेतु विवि स्तर पर लगभग 500 छात्रों का सर्वे किया गया। सर्वे के अनुसार मातृभाषा में हस्ताक्षर करने वाले छात्रों की संख्या पांच प्रतिशत से भी कम रही।
सर्वे में विश्वविद्यालय के अनेक विभागों के शोध छात्र व स्नातकोत्तर स्तर के विद्यार्थियों को शामिल किया गया। हस्ताक्षर किसी भी व्यक्ति की व्यक्तिगत मुद्रा होती है व हस्ताक्षर में व्यक्ति का मन व बुद्धि दोनों संयुक्त होते है, इसलिए हस्ताक्षर मातृभाषा में ही किया जाना चाहिए। इस दौरान विद्यार्थियों को हिंदी में अथवा मातृभाषा में हस्ताक्षर करने के लिए प्रोत्साहित किया गया। इस मौके पर डॉ. विजयश्री, डॉ. कृष्ण आर्य, डॉ. तेलुराम, आचार्य डॉ. विनोद कुमार सहित शोधार्थी व विद्यार्थी मौजूद रहे।