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समरसता के लिए आध्यात्म जरूरी : मुनिवत्सल

Wed, 26 Apr 2023 02:45 AM IST
अमर उजाला ब्यूरो संवाद न्यूज एजेंसी, कुरुक्षेत्र
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कुरुक्षेत्र। आधुनिक समाज में समरसता लाने के लिए आध्यात्मिकता की आवश्यकता है। भारतीय आध्यात्मिक संत परंपरा का महत्वपूर्ण योगदान मात्र भारत के लिए नहीं बल्कि समूची मानव जाति व सभी जीवों के लिए है। यह अक्षरधाम, नई दिल्ली के संत मुनिवत्सल स्वामी ने व्यक्त किए
वे मंगलवार को केयू के सीनेट हॉल में डॉ. भीम राव आंबेडकर अध्ययन केंद्र की ओर से ‘भारत की आध्यात्मिक संत परंपरा एवं सामाजिक समरसता’ विषय पर आयोजित व्याख्यान में बतौर मुख्य वक्ता हिस्सा ले रहे थे। उन्होंने कहा कि संतों ने व्यवसायिक वृत्ति से निर्वाह करते हुए आध्यात्मिक चिंतन के द्वारा सामाजिक समरसता लाने के लिए मिट्टी के बर्तन, कपड़े बनुकर, जूते गांठकर व हल चलाकर पुरुषार्थ किया। उनकी उदात्त संतता ने, साधुता ने, पारदर्शक आध्यात्मिक पवित्रता ने समाज में जो समरसता का वातावरण प्रकट किया, जिसने बंधुता, मैत्री, प्रेम, एकता, सौहार्द, समरसता के भाव से समाज को जोड़ने का काम किया है।
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केयू कुलपति प्रो. सोमनाथ सचदेवा ने कहा कि हमारी प्राचीन भारतीय संत परंपरा ने समाज का मार्गदर्शन करते हुए उसे एकता के सूत्र में पिरोने एवं सामाजिक समरसता लाने का कार्य किया। उन्होंने कहा कि भगवान शिव के अवतार माने जाने वाले आदि शंकराचार्य व महाकवि सूरदास की जयंती के अवसर पर इस कार्यक्रम की सार्थकता और बढ़ जाती है। आदि गुरु के नाम से प्रख्यात शंकराचार्य ने अद्वैत वेदांत का परिपादन किया तथा ब्रह्म को ही जगत की उत्पत्ति एवं प्रलय का कारण माना।
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केयू के डॉ. भीमराव आंबेडकर अध्ययन केंद्र के निदेशक प्रो. गोपाल प्रसाद ने कहा कि भारतीय ऋषियों-मुनियों ने आध्यात्मिक ज्ञान के बल पर सामाजिक बुराइयों को दूर करके सामाजिक समरसता लाने का कार्य करते हुए एक भारत, श्रेष्ठ भारत में महत्वपूर्ण भूमिका का निर्वाह किया। इस मौके पर ज्ञानमंगल स्वामी, आयुष विश्वविद्यालय के कुलसचिव डॉ. नरेश भार्गव, प्रो. सीआर जिलोवा, प्रो. महाबीर रंगा, प्रो. प्रदीप चौहान, डॉ. महासिंह पूनिया, डॉ. गुरचरण सिंह डॉ. वीरेंद्र पाल, डॉ. रामचंद्र, संजय, प्रेम, दलबीर मान आदि मौजूद रहे।
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