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दूध, गंगाजल, भांग, धतूरा, बेलपत्र से किया भगवान शिव का रुद्राभिषेक

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श्रावण के पहले सोमवार को शिवालयों में श्रद्धालुओं का तांता लगा रहा। बारिश के बीच भी श्रद्धालु भारी संख्या में पूजा अर्चना करने मंदिर पहुंचे। कोरोना गाइडलाइन का पालन करते हुए श्रद्धालुओं ने मंदिर में प्रवेश किया। ऐतिहासिक स्थाणेश्वर महादेव, कालेश्वर महादेव, ब्रह्मसरोवर स्थित सर्वेश्वर महादेव, प्रसिद्ध दु:ख भंजन मंदिर, संगमेश्वर महादेव, पृथ्वेश्वर महादेव बड़ा शिवालय, आशुतोष महादेव, पशुपति नाथ महादेव सहित सभी शिवालयों में श्रद्धालुओं भीड़ रही। श्रद्धालुओं ने जल, दूध, दही, घी, शक्कर, शहद, भांग, धतूरा, फूल, फल व इत्र से भगवान शिव का रुद्राभिषेक किया। कतार में लगे श्रद्धालुओं ने ओम नम: शिवाय, हर-हर महादेव, हर-हर गंगे, बम-बम भोले नाम का जाप किया। स्थाणेश्वर महादेव मंदिर के महंत बंसी पुरी ने बताया कि वैसे तो श्रावण का हर दिन भगवान शिव की आराधना के लिए महत्वपूर्ण है मगर सोमवार विशेष दिन होता है। भगवान शिव मात्र एक लोटा जल से भी प्रसन्न हो जात है। शिव की पूजा अर्चना करने से उनके भक्त को कभी अकाल मृत्यु का भय नहीं सताता है, क्योकि भगवान शिव स्वयं महाकाल है। वहीं संगमेश्वर महादेव मंदिर के सचिव महंत विश्वनाथ गिरी ने बताया कि श्रावण के प्रत्येक दिन मंदिर में सुबह 11 हजार बेलपत्र से भगवान शिव की पूजा अर्चना की जा रही है। वहीं दीमक की बांबी से लाई गई मिट्टी से निर्मित पार्थेश्वर शिवलिंग का रोजाना रुद्राभिषेक करके अरुणा संगम तीर्थ में विसर्जन किया जाता है। सर्वप्रथम भगवान राम ने लंकापति रावण पर विजय प्राप्त करने के लिए पार्थेश्वर शिवलिंग का निर्माण किया था। आज वह स्थान ज्योर्तिलिंग रामेश्वरम के नाम से सुप्रसिद्ध है। उन्होंने बताया कि श्रावण मास में कालसर्प दोष से मुक्ति के लिए विशेष पूजा अर्चना की जाती है। राहु को अधिदेवता काल और केतु को प्रत्यधि देवता सर्प माना गया है। कुंडली में कालसर्प दोष होने से व्यक्ति को छोटी-छोटी सफलताओं के लिए अधिक मेहनत करनी पड़ती है। वहीं मंदिर प्रबंधन की ओर से कोरोना गाइडलाइन को देखते हुए एक समय में केवल पांच लोगों को ही प्रवेश दिया गया।
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