संवाद न्यूज एजेंसी
कुरुक्षेत्र। कुरुक्षेत्र विश्वविद्यालय के युवा एवं सांस्कृतिक कार्यक्रम विभाग द्वारा रत्नावली राज्य स्तरीय सांस्कृतिक समारोह का आयोजन 28 से 31 अक्तूबर होगा। समारोह में पूरे प्रदेश के कलाकार अलग-अलग मंचों से अपनी प्रतिभा का प्रदर्शन करेंगे। रत्नावली का लोगो कुलपति प्रो. सोमनाथ सचदेवा एवं कुलसचिव डॉ. संजीव शर्मा जारी कर चुके है।
रत्नावली का लोगो वास्तव में हरियाणा की सांस्कृतिक पहचान का परिचायक है। रत्नावली नामकरण भी सातवीं सदी के थानेसर के इतिहास का साक्षी है। कुरुक्षेत्र विश्वविद्यालय में आयोजित रत्नावली समारोह में बृज क्षेत्र की नृत्यांगना को प्रतीक चिह्न के रूप में स्थापित किया गया है। वास्तव में हरियाणा व बंचारी में होली के अवसर पर नृत्य की परंपरा रही है। युवा एवं सांस्कृतिक कार्यक्रम विभाग के निदेशक डॉ. महासिंह पूनिया ने बताया कि रत्नावली नामकरण का इतिहास महाराजा हर्षवर्धन से जुड़ा हुआ है। राजा हर्षवर्धन द्वारा लिखित नाटक ‘रत्नावली’ के दो पात्र चरचरी एवं हलिष्का नृत्यांगना के रूप में विख्यात रही हैं। यही परंपरा हरियाणवी लोकजीवन में सदियों पुरानी चली आ रही है।
उन्होंने बताया कि हर्षवर्धन के समय में कुरुक्षेत्र की राजधानी थानेसर में एक महीने तक मदनोत्सव मनाया जाता था। लोकजीवन में इसे हम फागण उत्सव भी कह सकते हैं। फागण में हरियाणा के सभी क्षेत्रों खादर, बांगर, बागड़, अहीरवाल, बृज, मेवात सभी क्षेत्रों यह परंपरा देखने को मिलती रही है। बृज क्षेत्र में यह परंपरा दूसरे क्षेत्रों की अपेक्षा अधिक है, क्योंकि वहां पर श्रीकृष्ण और राधा लोकजीवन का ऐसा महत्वपूर्ण हिस्सा हैं जो फागण उत्सव का हिस्सा बन उसे आज भी जीवित रखे हैं।
उन्होंने बताया कि केयू सांस्कृतिक विभाग के पूर्व निदेशक अनूप लाठर ने बंचारी नृत्य की जब सन 1988 में डॉक्यूमेंटेशन की तो उन्होंने पाया कि बंचारी में नृत्य करते हुए महिलाएं इसी स्वरूप में नाचती हैं। उन्होंने होली के अवसर पर नाचती हुई महिला का चित्र खींचा। यही चित्र लोक पारंपरिक नृत्य का हिस्सा है। लोकनृत्य रसिया की पद्चाप एवं परंपरा हरियाणा के दूसरे नृत्यों से भिन्न है।
पूनिया ने बताया कि इससे पूर्व हरियाणा दिवस पर आयोजित राज्य स्तरीय समारोह को हरियाणा दिवस समारोह के नाम से जाना जाता था। सन 2006 में इस समारोह का नामकरण रत्नावली के नाम से हुआ। तब से लेकर अब तक रत्नावली केयू का सांस्कृतिक समारोह भारत ही नहीं अपितु विदेशों में भी लोकप्रिय हो चुका है।