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अंतरराष्ट्रीय गीता संगोष्ठी : श्रीमद्भगवद्गीता और महाभारत के इतिहास पर किया मंथन

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कुरुक्षेत्र। संगोष्ठी में संबो​धित करते हुए डॉ. स्वामी शाश्वतानंद। संवाद
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कुरुक्षेत्र। कुरुक्षेत्र विश्वविद्यालय एवं कुरुक्षेत्र विकास बोर्ड के सहयोग से तीन दिवसीय अंतरराष्ट्रीय संगोष्ठी के दूसरे दिन सेंटर फॉर डॉ. बीआर आंबेडकर स्टडीज द्वारा श्रीमद्भगवद्गीता और महाभारत के इतिहास पर मंथन किया गया। मुख्यातिथि डॉ. स्वामी शाश्वतानंद गिरी ने कहा कि हिंदू चिंतन धारा में सदैव जानने का महत्व रहा है, मानने का महत्व नहीं रहा। संपूर्ण विश्व में भारतीय संस्कृति, चिंतन, ज्ञान परंपरा व समग्रता का भाव विशिष्ट रही है। उन्होंने कहा कि श्रीमद्भगवद्गीता और महाभारत की ऐतिहासिकता के विषय में सत्य कभी बदलता नही हैं क्योंकि जितनी भी विधाओं की खोज कर ली जाए, लेकिन भारतीय चिंतन की दृष्टि से इसमें कोई विरोधाभास नहीं मिलेगा। इसके साथ ही उन्होंने भारतीय संस्कृति पर गर्व करने व भारतीय होने की गरिमा को पहचानने पर जोर दिया।
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कुलपति प्रो. सोमनाथ सचदेवा ने विश्वविद्यालय के ध्येय वाक्य योगस्थ कुरु कर्माणि को जीवन जीने के सार रूप में व्यक्त करते हुए कहा कि सफलता हो या असफलता मनुष्य को संभव बनाकर अपने कर्त्तव्यों का निर्वहन करना चाहिए। उन्होंने कहा कि मनुष्य का अधिकार केवल कर्म करने में है इसलिए यदि व्यक्ति अपेक्षाओं का त्याग करे तो वह निजी, प्रोफेशनल एवं सामाजिक जीवन में अच्छी उन्नति कर सकता है।
इंडियन इंस्टीट्यूट ऑफ रिसर्च ऑन वेद की पूर्व निदेशिका सरोज बाला ने कहा कि यदि महाभारत काल्पनिक है तो गीता का ज्ञान कहां से आया। उन्होंने कहा कि वेदों का ज्ञान अनादि अनंत है। उन्होंने पीपीटी के माध्यम से महाभारत के युद्ध के समयकाल तथा हस्तिनापुर के पास सोनाली क्षेत्र में मिलने वाले रथ के बारे में अहम जानकारी साझा की। वक्ता पुरातत्ववेत्ता अरिका ने कहा कि कहा कि भारतीय सांस्कृतिक व ज्ञान परंपरा समृद्ध है। उन्होंने डॉ. संजय कुमार व डॉ. सूरजभान के महाभारत काल से संबंधित पुरातत्व क्षेत्र में किए गए शोध एवं अनुसंधान की भी सराहना की।
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केडीबी मानद सचिव उपेंद्र सिंघल ने विशिष्ट अतिथि कहा की कुरुक्षेत्र विकास बोर्ड द्वारा पांच जिलों में 164 तीर्थों के विकास एवं सांस्कृतिक धरोहर के संरक्षण में महत्वपूर्ण कार्य कर रहा है। पूर्व क्यूरेटर एवं पूर्व उपनिदेशक श्रीकृष्ण संग्रहालय राजेश पुरोहित ने ओडिशा से ऑनलाइन जुड़कर कहा कि भीष्म पितामह के रणभूमि में युद्ध त्याग के साथ ही संजय उवाच के साथ महाभारत में गीता वृतांत का आरंभ होता है।
सेमिनार निदेशक प्रो. तेजेंद्र शर्मा ने भारतीय संस्कृति, मूल्यों व आत्मा को पहचानने के लिए इतिहास को दोबारा खोजने की बात कही। वहीं केंद्र के निदेशक प्रो. गोपाल प्रसाद ने कहा कि केंद्र की स्थापना 1992 में हुई थी, तभी से केंद्र डॉ. आंबेडकर के सामाजिक समरसता के विचारों को देश दुनिया में पहुंचाने का कार्य कर रहा है।


श्रीमद्भगवद्गीता में प्रतिपादित सामाजिक समरसता विषय पर किया मंथन
संगोष्ठी के तकनीकी सत्र में संस्कृत-पालि-प्राकृत विभाग द्वारा श्रीमद्भगवद्गीता में प्रतिपादित सामाजिक समरसता विषय पर मंथन किया गया। मुख्य वक्ता प्रो. वीरेंद्र अलंकार ने कहा कि श्रीमद्भगवद्गीता मानव को जीवन की विकट समस्याओं में मार्ग दिखाती है व समाज को एक सूत्र में बांधती है। वर्तमान सामाजिक परिस्थिति के संदर्भ में कहा कि श्रीमद्भगवद्गीता की वर्ण व्यवस्था समाज को व्यवस्थित रूप प्रदान करती है।
वक्ता प्रो. सी उपेंद्र राव ने कहा कि गीता ऐसा ग्रंथ है जो कि देश व काल की सीमा से परे है। इसके ज्ञान द्वारा मानव मन में भ्रातृत्व की भावना का विकास होता है और यह सामाजिक समरसता का प्रमुख तत्व है। उन्होंने कहा कि गीता प्राणिमात्र में ईश्वर का अस्तित्व स्वीकारती है जो कि समाज के सभी मनुष्यों में विद्यमान है। ब्रह्माकुमारी ईश्वरीय विश्वविद्यालय से आई बहन वीके वीना ने श्रीमद्भगवद्गीता की आध्यात्मिक चेतना पर वर्तमान संदर्भ में प्रकाश डाला। इस सत्र के लिए 54 रजिस्ट्रेशन हुए थे, जिनमें से देश व विदेश से आए प्राध्यापकों एवं शोधार्थियों ने 40 शोध पत्रों को संगोष्ठी में प्रस्तुत किया और अन्य शेष शोधपत्रों पर विद्वानों ने चर्चा की।


वसुधैव कुटुंबकम के लिए गीता आधारित नीडोनॉमिक्स को अपनाना जरूरी : प्रो. गोयल

संगोष्ठी में 18 दिसंबर को विद्वानों ने वसुधैव कुटुंबकम विषय पर भी विस्तार से चर्चा की और गीता के मर्म को समझाया। इसमें पूर्व कुलपति प्रो. मदन मोहन गोयल जिन्हें नीडोनॉमिक्स स्कूल ऑफ थॉट के प्रवर्तक के रूप में जाना जाता है। वह अर्थशास्त्र विभाग से सेवानिवृत्त हुए है। उन्होंने कहा कि आश्वस्त परिवार बनने हेतु हमें अपनी सामूहिक प्रतिबद्धता के गुणक प्रभाव के लिए गीता-आधारित नीडोनॉमिक्स को अपनाना चाहिए।

उनका विषय वसुधैव कुटुंबकम हेतु गीता-आधारित नीडोनॉमिक्स की प्रासंगिकता था, जिसके बारे में उन्होंने विद्यार्थियों को सरलता से युवाओं को गीता की राह पर चलने के लिए प्रेरित किया। उनका कहना है कि जी 20 दिल्ली शिखर सम्मेलन में अनिवार्य एक पृथ्वी, एक परिवार, एक भविष्य की भावना को साकार करने के लिए गीता आधारित नीडोनॉमिक्स को अपनाना बहुत जरूरी है। वसुधैव कुटुंबकम में वैश्विक पारिवारिक दृष्टिकोण को प्राप्त करने के लिए व्यय से अधिक कमाई के साथ परोपकारिता के लिए स्ट्रीट स्मार्ट होने की सामूहिक प्रतिबद्धता की आवश्यकता है।
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