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Kurukshetra News: कुरु भूमि में भगवान ने एक नहीं दो बार धारण किया अपना विराट स्वरूप

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कुरुक्षेत्र। कुरु भूमि में भगवान ने एक नहीं दो बार विराट स्वरूप धारण किया। द्वापर में महाभारत युद्ध से पहले भगवान ने विराट रूप लेकर अर्जुन का मोह भंग किया था। इससे ही एक युग पहले त्रेता में भगवान ने वामन रूप धारण कर राजा बलि को इंद्र पद देने का वरदान दिया था। कुरुक्षेत्र से 48 कोस का इलाका महाभारत का क्षेत्र माना गया है। मौजूदा 48 कोस की परिधि में हरियाणा प्रदेश के पांच जनपद कुरुक्षेत्र, करनाल, कैथल, पानीपत और जींद शामिल हैं।
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मान्यता है कि इस 48 कोस में महाभारत का महायुद्ध हुआ था। इस युद्ध से पूर्व श्रीकृष्ण ने गीता का अमर संदेश दिया था, मगर इस घटना से पहले त्रेता युग में भगवान का पहला मनुष्य अवतार वामन के रूप में हुआ था। मान्यता है कि 48 कोस में सात वन अदिति वन, काम्यक वन, शीत वन, सूर्य वन, मधु वन, फलकी वन, व्यास वन शामिल हैं। कई पुराण में उनका उल्लेख विस्तार से मिलता है। इन पुराणों में सरस्वती नदी अपनी सहायक नौ नदियों अपगा, सप्तसारस्वत धारा, वैतरणी, इक्षुमती, कोसकी, दृषद्वती सहित अन्य नदियां के साथ इस क्षेत्र से बहती थी। इसका प्रमाण भी पुराणों में है।
इन सात वनों में अदिति वन (अभिमन्युपुर) वह क्षेत्र जहां माता अदिति और ऋषि कश्यप ने भगवान विष्णु को पुत्र रूप में प्राप्त करने के लिए तपस्या की थी। उनकी तपस्या से प्रसन्न होकर भगवान विष्णु ने उन्हें वामन रूप में अवतरित होने का वचन दिया था कि वह बलि से उनके पुत्रों की रक्षा के लिए उनके गर्भ से अवतार लेंगे। माता अदिति ने इस स्थान पर सूर्य कुंड पर पयोव्रत का अनुष्ठान किया था, जिसके पश्चात भगवान ने माता अदिति के गर्भ से अवतार लिया था। अवतार लेते ही भगवान ने त्रिगुणात्मक वामन रूप धारण किया था।
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राजा बलि से मांगी तीन पग भूमि
विश्व विजय यज्ञ कर रहे राजा बलि से वामन भगवान ने मात्र तीन पग भूमि मांगी थी। राजा बलि का वचन प्राप्त होते ही भगवान ने विराट (विक्रमी) रूप लेकर एक पग में पृथ्वी और दूसरे से आकाश को नाप लिया। तीसरे पग के लिए स्थान मांगा तो राजा बलि ने आदर सहित झुक कर भगवान को अपने सिर पर तीसरा पग रखने का आग्रह किया था। राजा बलि की इस धर्मपरायणता से प्रसन्न होकर भगवान ने उनको पाताल का राजा और सावर्णिक मन्वंतर (आठवें) में इंद्र पद देने का वरदान दिया था। हालांकि इससे पहले दैत्य गुरु शुक्राचार्य ने राजा बलि को भगवान की लीला बताते हुए वचन न देने का आदेश दिया था, मगर राजा बलि ने उसकी परवाह किए बगैर वचन दिया। बाद में उनको अपने गुरु का श्राप भी भुगतना पड़ा था।

सौंगल तीर्थ घटना का साक्षी
48 कोस में शामिल कैथल का सौंगल तीर्थ भगवान वामन, बलि के संवाद और विक्रमी (विराट) रूप का साक्षी है। वामन और महाभारत पुराण में उल्लेख मिलता है कि तीनों लोक में प्रसिद्ध वामन तीर्थ में जाएं, जहां भगवान विष्णु ने वामन रूप धारण कर राजा बलि के राज्य का हरण कर उसे इंद्र को प्रदान किया। वहां स्नान करके विष्णु और वामन का अर्चन कर मनुष्य सब पापों से शुद्ध होकर विष्णु लोक को प्राप्त करेगा। इस तीर्थ को विष्णुपद तीर्थ के नाम से भी जाना जाता है।
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