संवाद न्यूज एजेंसी
कुरुक्षेत्र। हरियाणा अपने हिस्से के लिए पानी की एक एक बूंद लेकर रहेगा। इस हक की लड़ाई मुख्यमंत्री मनोहर लाल के नेतृत्व में लड़ी जाएगी। हरियाणा अपने हक के पानी के लिए आरपार की लड़ाई लड़ने को भी तैयार है। यह बातें विधायक सुभाष सुधा ने कहीं। वे अपने आवास कार्यालय पर कार्यकर्ताओं से बातचीत कर रहे थे।
उन्होंने कहा कि अब प्रदेश सरकार को इस मामले में पंजाब के साथ कोई बात नहीं करनी चाहिए और न ही किसी तरह की बैठक होनी चाहिए, क्योंकि पंजाब के रवैये से साफ हो चुका है कि वह इस मसले का हल नहीं निकालेगा। अब सुप्रीम कोर्ट और केंद्र सरकार ही इसमें अपनी भूमिका निभा सकती है। ऐसे में सुप्रीम कोर्ट या केंद्र सरकार को जिम्मेदारी लेनी चाहिए कि हरियाणा को पर्याप्त पानी की उपलब्धता सुनिश्चित करे। इस मामले में सुप्रीम कोर्ट साल 2002 में हरियाणा के पक्ष में फैसला सुनाया था और पंजाब को एसवाईएल केनाल एक साल के अंदर बनाने का निर्देश दिया था।
वहीं साल 2004 में पंजाब की याचिका के बाद सुप्रीमकोर्ट ने अपने पुराने फैसले को कायम रखा और याचिका खारिज कर दी। इसके बाद पंजाब ने कानून पास करके हरियाणा के साथ एसवाईएल नहर परियोजना के समझौते को रद्द कर दिया। शीर्ष न्यायालय का पूरे मामले पर कहना है कि प्राकृतिक संसाधनों को आपस में साझा किया जाना चाहिए इसलिए दोनों राज्यों के मुख्यमंत्री आपस में समस्या का समाधान निकालें। कोई भी राज्य या शहर यह नहीं कह सकता कि केवल उसे ही पानी की जरूरत है। बड़ा दृष्टिकोण रखते हुए पानी जैसे प्राकृतिक संसाधन को आपस में साझा करना चाहिए।
उन्होंने कहा कि पंजाब पुनर्गठन अधिनियम ए 1966 के प्रावधान के अंतर्गत भारत सरकार के आदेश 24 मार्च 1976 के अनुसार हरियाणा को रावी ब्यास के फालतू पानी में से 3.5 एमएएफ जल का आवंटन किया गया था। एसवाईएल केनाल का निर्माण कार्य पूरा न होने की वजह से हरियाणा केवल 1.62 एमएएफ पानी का इस्तेमाल कर रहा है। पंजाब अपने क्षेत्र में एसवाईएल केनाल का निर्माण कार्य पूरा न करके हरियाणा के हिस्से के लगभग 1.9 एमएएफ जल का गैरकानूनी ढंग से उपयोग कर रहा है।