अंतरराष्ट्रीय गीता महोत्सव के चलते धर्मनगरी को शिल्प और लोक कला केंद्र के रूप में एक अनोखी पहचान मिल रही है। इस बार भी ब्रह्मसरोवर तट पर देश के कोने-कोने से श्रद्धालु, पर्यटक, शिल्पकार व कलाकार जुटे हैं, जिससे यहां लघु भारत का नजारा दिखाई दे रहा है।
गीता महोत्सव के मंच पर देश के 23 राज्यों से 600 से ज्यादा शिल्पकार पहुंचे है और देश के छह से ज्यादा राज्यों के लोक कलाकार अपने-अपने प्रदेश की संस्कृति की छटा बिखेर रहे हैं। महोत्सव में अनेक राज्यों से आए कलाकार अपनी हस्तकला के माध्यम से अपनी कला का हुनर दिखा रहे हैं। शिल्पकारों की कला गीता महोत्सव का आकर्षण का केंद्र बिंदु बने हुए हैं। पर्यटकों को ब्रह्मसरोवर के घाटों पर जम्मू और कश्मीर, हिमाचल, पंजाब, राजस्थान, मध्य प्रदेश, पश्चिम बंगाल सहित दक्षिण भारत के राज्यों की संस्कृति व शिल्पकारी की प्रस्तुतियां दी जा रही है।
गीता महोत्सव के दौरान ब्रह्मसरोवर के पावन तट पर सजी सदरियों में विभिन्न प्रदेशों के तरह-तरह के लजीज व्यंजन पर्यटकों खुब को लुभा रही है। इन व्यंजनों में राजस्थान की कचोरी, पंजाब की लस्सी, बिहार का लिटी चोखा, कश्मीर का कावा जैसे विभिन्न क्षेत्रों का स्वाद खुश होकर ले रहे हैं। इसके साथ-साथ पर्यटक विभिन्न प्रदेशों की शिल्पकला से सजे स्टॉलों पर भी जमकर खरीदारी कर रहे हैं और शिल्पकारों की शिल्पकला की भी जमकर सराहना की जा रही है।
बाक्स
मिट्टी कला की प्रदर्शनी पर्यटकों का मोह रही मन
मिट्टी से नए तरीके से वस्तुओं को बनाकर अपनी कला का प्रदर्शन करने वाले संदीप बता रहे हैं, वह स्नातक पास है और यह उनका पुश्तैनी काम है। वह कहते हैं कि इस काम में उनके परिवार ने अलग ही आयाम हासिल किया है। उनके परिवार के अलग-अलग सदस्यों ने इसमें राष्ट्रीय, राज्य स्तरीय व अन्य पुरस्कार अपने नाम किए हैं। वहीं संदीप कुमार बताते हैं, कि उनके पिता शोभा राम को आईफा ने डॉक्टरेट की मानद उपाधि प्रदान की है। तो उनके फूफा हरि कृष्ण को पद्मश्री मिला है। सरकार ने भी हमारी कला को देखते हुए माटी कला बोर्ड के माध्यम से हमें सहायता प्रदान कर रही है।
बाक्स
मध्य प्रदेश की भील कला से रूबरू हुए पर्यटक
ब्रह्मसरोवर पर मध्यप्रदेश की भील कला से भी पर्यटक रूबरू हो रहे हैं। इस कला की प्रदर्शनी लगाने वाले सुभाष कटारा बताते हैं कि यह कला मध्य प्रदेश में आम तौर पर घरों में विवाह शादी में दीवारों पर कपड़ों करते थे। अब यह धीरे-धीरे लुप्त होती जा रही है। वह बताता है कि वह आठ साल से अलग-अलग मेलों में अपनी कला का प्रदर्शन करके रोजी रोटी चला रहा है। लोग काफी पसंद कर रहे हैं। आप को बता दे भील कला कैनवास के कपड़े व दीवारों पर बिंदुओं के माध्यम से मनाई जाने वाली चित्रकारी है। स्टाल पर 500 से लेकर 20 हजार रुपये तक की पेंटिंग है।