कुरुक्षेत्र। भारतीय किसान यूनियन अध्यक्ष गुरनाम सिंह चढूनी पंजाब के बाद अब हरियाणा में भी सियासी जमीन पर वोटों की खेती नहीं कर पाए। अपनी संयुक्त संघर्ष पार्टी बनाकर पहली बार विधानसभा चुनाव में उतरे चढूनी को महज 1170 वोट मिल पाए। करीब तीन साल पहले 18 दिसंबर 2021 को वे संयुक्त संघर्ष पार्टी बनाकर सियासत के मैदान में पिहोवा विधानसभा क्षेत्र में उतरे थे। उनका कहना था कि सड़क की बजाय विधानसभा जाकर किसान वर्ग अपनी लड़ाई में जल्दी जीत हासिल कर सकेगा। हालांकि अन्य किसान संगठनों ने उनके राजनीति में जाने का पुरजोर विरोध किया, मगर चढ़ूनी ने विरोध के बावजूद नई राजनैतिक पार्टी का गठन कर किसानों को राजनीति में आने को प्रेरित किया।
उन्होंने सिख बाहुल्य पिहोवा विस क्षेत्र से चुनाव में जीत का दावा ठोका था। पंजाब से सटे इस इलाके में उनको सिख और किसान से बेहतरीन नतीजों की उम्मीद थी, मगर चुनाव के नतीजे इसके बिल्कुल विपरीत आए। चढूनी की न सिर्फ हार हुई बल्कि जमानत बचाने में भी असफल रहे। पिहोवा विस क्षेत्र से उनको पोस्टल समेत कुल 1170 वोट प्राप्त हुए। इलाके से उनको मात्र 0.91 फीसदी मत ही मिल पाए। इसके पहले चढूनी ने साल 2019 में लाडवा विस क्षेत्र से निर्दलीय चुनाव लड़ा था, जिसमें उनको कुल 1307 मत मिले थे। लाडवा विस से उनको मात्र 0.95 फीसदी मतदाताओं ने ही स्वीकार किया था।
पंजाब में भी चुनाव लड़ चुकी पार्टी
गुरनाम सिंह चढ़ूनी की पार्टी पंजाब में भी विधानसभा चुनाव लड़ चुकी है। करीब दो साल पहले साल 2022 में पार्टी ने विधानसभा चुनाव में अपने 10 प्रत्याशी उतारे थे, लेकिन पार्टी मतदाताओं पर कोई प्रभाव छोड़ने में विफल रही थी। हालांकि गुरनाम सिंह चढूनी किसान नेता के रूप में हरियाणा, पंजाब, यूपी और राजस्थान में बड़ा चेहरा हैं। तीन कृषि कानून के खिलाफ दिल्ली बॉर्डर पर चली लंबी लड़ाई में चढूनी ने अहम भूमिका निभाई थी। उसके बाद सूरजमुखी फसल की एमएसपी पर खरीद को लेकर उनका सरकार के साथ टकराव हुआ था।
हुड्डा पर फोड़ा हार का ठीकरा
चढूनी ने हार का ठीकरा पूर्व मुख्यमंत्री भूपेंद्र हुड्डा पर फोड़ा है। उन्होंने बातचीत में कहा कि हुड्डा ने न केवल कांग्रेस व आप बल्कि किसानों को भी इस स्थिति में ला खड़ा किया है, जिसके पीछे उनकी मनमानी रही है। किसान एक सीट मांग रहे थे, जो नहीं दी। आप के साथ भी समझौता नहीं होने दिया बल्कि पहले का समझौता भी तुड़वा दिया। कांग्रेस के प्रत्याशी भी मनमानी से ही उतरवाए तो रूठों को मनाया तक नहीं।