अमर उजाला ब्यूरो
कुरुक्षेत्र।
भारत में राष्ट्रवाद का बेहतरीन रूप 1857 के गदर, बंगाल विभाजन और 1942 के भारत छोड़ो आंदोलन के रूप में देखा जा सकता है। ये बातें डा के. एल. टुटेजा ने ग्रेवाल स्मृति व्याख्यान देते हुए कही। उन्होंने रवींद्र नाथ टैगोर की 1902 में लिखी हिस्ट्री आफ इंडिया का हवाला देकर कहा कि विभिन्नताएं ही राष्ट्र की शक्ति हैं। डा ओमप्रकाश ग्रेवाल अध्ययन संस्थान द्वारा आयोजित इस संगोष्ठी में इन्द्र सिंगला ने बहस का प्रारम्भ करते हुए कहा कि नई तकनीक, सकारात्मक वातावरण से हम युवाओं में देशभक्ति की भावना पैदा कर सकते हैं। प्रोफेसर हेमराज शर्मा ने कहा कि सांप्रदायिकता के घोड़े पर सवार तो हुआ था सकता है लेकिन उतरा नहीं जा सकता। मनमोहन ने कहा कि वर्तमान में राष्ट्रवाद के नाम पर झूठ, चालाकी का बोलबाला है। बी वी अबरोल ने कहा कि लोगों की एकता को कमजोर करना राष्ट्र द्रोह है। डॉ टी आर कुण्डू ने अध्यक्षीय भाषण में कहा कि लोगों के गुणात्मक संबंध, समानता, मैत्री और स्वायत्तता राष्ट्रीय एकता के लिए जरूरी है।