कुरुक्षेत्र। संस्कृत सदाचार से जीने की कला सिखाती है। एकमात्र संस्कृत ही ऐसी भाषा है जो विश्व की प्राचीनतम भाषाओं की जननी है। अब तो विज्ञान ने भी प्रमाणित किया है कि संस्कृत ही एक ऐसी भाषा है जो संस्कृत से भी अधिक वैज्ञानिक भाषा है। जितनी शुद्ध व्याकरण संस्कृत की है, उतनी किसी अन्य भाषा की नहीं है। भारत की संस्कृति को जानना हो तो संस्कृत भाषा का ज्ञान होना आवश्यक है। संस्कृत के मुकाबले में दुनिया का कोई भी साहित्य नहीं है। यह विचार केयू कुलपति डॉ केसी शर्मा ने व्यक्त किए। वे रविवार को गीता निकेतन विद्यालय में दस दिवसीय आवासीय संस्कृत प्रशिक्षण शिविर के समापन अवसर पर मुख्यातिथि के तौर पर बोल रहे थे। विद्या भारती संस्कृति शिक्षा संस्थान के शोध निदेशक डॉ. हिम्मत सिंह सिन्हा के सान्निध्य में हुए इस कार्यक्रम में प्रेरणा संस्था के संस्थापक जयभगवान सिंगला विशिष्ट अतिथि रहे। इस दौरान संस्कृत भारती के प्रांत अध्यक्ष डॉ. सुरेंद्र मोहन मिश्र मुख्य वक्ता रहे। विशिष्ट अतिथि जयभगवान सिंगला ने कहा कि संस्कृत को हीन अथवा मृत भाषा न समझें। डॉ. हिम्मत सिंह सिन्हा ने कहा कि दुनिया की सबसे सभ्य भाषाओं में एकमात्र संस्कृत भाषा है। यह पूर्ण भाषा मानी गई है। शिविर के वर्गाधिकारी आचार्य हरिदेव शास्त्री ने बताया कि संस्कृत भारती 1981 से संस्कृत को जन-जन की व्यवहार भाषा बनाने के लिए समर्पित है। इस शिविर में 132 प्रशिक्षणार्थियों ने संस्कृत का व्यवहारिक ज्ञान सीखा, जिसमें विद्यार्थियों के अलावा शिक्षक, प्रोफेसर, गृहणियां, नौकरीपेशा, कृषक आदि शामिल रहे। कार्यक्रम में संस्कृत भाषा के प्रसार के लिए पुस्तकों का स्टॉल भी लगाया गया। इस अवसर पर प्रांत मंत्री डॉ. जोगिंद्र सिंह, वर्ग संयोजक रामनिवास शर्मा, मल्टी आर्ट सेंटर के प्रभारी महेश जोशी, डॉ. श्रेयांश द्विवेदी, डॉ. शिवानी शर्मा, गीता निकेतन के प्राचार्य डॉ. ऋषि गोयल, आचार्य नरेश कौशिक, अनिल कुलश्रेष्ठ सहित अन्य शामिल रहे।