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Karnal News: संतान की दीर्घायु, समृद्धि के लिए महिलाएं रखेंगी स्कंद षष्ठी व्रत

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- भगवान कार्तिकेय की 11 जुलाई को की जाएगी पूजा
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संवाद न्यूज एजेंसी

करनाल। स्कंद षष्ठी का व्रत 11 जुलाई को रखा जाएगा। इस दिन भगवान कार्तिकेय की पूजा की जाएगी। श्री श्याम बाला जी ज्योतिष केंद्र के संचालक पंडित विनोद शास्त्री के अनुसार आषाढ़ मास की स्कंद षष्ठी 11 जुलाई को सुबह 10 बजकर 03 मिनट से शुरू होगी और 12 जुलाई को दोपहर 12 बजकर 32 मिनट पर समाप्त होगी। मान्यता के अनुसार इस दिन महिलाएं संतान की लंबी उम्र, सुख-समृद्धि और खुशहाली के लिए व्रत रखती हैं। संतान प्राप्ति की इच्छा के लिए भी स्कंद षष्ठी का व्रत रखना शुभ और फलदायी माना जाता है।
दक्षिण भारत में अति महत्वपूर्ण माना जाने वाला स्कंद षष्ठी का व्रत प्रत्येक महीने की शुक्ल पक्ष की षष्ठी तिथि के दिन रखा जाता है। यह व्रत भगवान शिव और माता पार्वती के बड़े बेटे कार्तिकेय को समर्पित है। दक्षिण भारत में कार्तिकेय को स्कंद के नाम से पूजा जाता है। मां की ओर से अपने बच्चों के लिए व्रत रखने का विशेष महत्व माना जाता है।
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शुक्ल पक्ष की षष्ठी तिथि के दिन भगवान शिव और माता पार्वती के पुत्र भगवान कार्तिकेय ने तारकासुर नाम के राक्षस का वध किया था। इसलिए कार्तिकेय की विजय के उपलक्ष्य में इस दिन स्कंद षष्ठी व्रत रखा जाने लगा। कहा जाता है कि स्कंद षष्ठी के दिन भगवान कार्तिकेय का विधि विधान के साथ व्रत और पूजन करने से साधक शत्रुओं पर विजय प्राप्त करता है और जीवन में चल रही समस्याओं से भी छुटकारा मिल जाता है।

कैसे करें पूजा

स्कंद षष्ठी के दिन सुबह जल्दी उठकर नित्य क्रिया के बाद घर की सफाई करने के बाद स्नान करें और साफ और स्वच्छ वस्त्र धारण करें और स्कंद षष्ठी का व्रत करने का संकल्प करें। फिर घर के मंदिर की अच्छे से सफाई करें और स्कंद षष्ठी के दिन भगवान कार्तिकेय के साथ-साथ उनके माता-पिता भगवान शिव और माता पार्वती का भी पूजन करने की परंपरा है।
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स्कंद षष्ठी के दिन संपूर्ण शिव परिवार की पूजा करनी चाहिए, इसके लिए इस दिन पूजा के लिए ऐसी तस्वीर या प्रतिमा रखें। जिसमें संपूर्ण शिव परिवार हो। अब दीपक और धूप जलाकर पूजा शुरू करें। इसके बाद सभी को फल, फूल, सिंदूर, अक्षत और मौली अर्पित करें। फिर मिठाई का भोग लगाएं और व्रत कथा पढ़ें। कथा पूरी होने के बाद आरती करें और भगवान से पूजा के दौरान होने वाली गलतियों के लिए क्षमा याचना करें और भोग लगाकर प्रसाद का वितरण करें।
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