- अधिकारी बोले, उन्होंने अभिभावकों को ही माना गुरु
माई सिटी रिपोर्टर
करनाल। अभिभावक ही प्रथम गुरु हैं और दूसरा गुरु है जीवन, जो हर कदम पर नई सीख देता है। कभी शिष्य की भूमिका में लाकर कुछ सीखने का अवसर पैदा करता है तो कभी नेतृत्व के रूप में गुरु बनाकर दूसरों को आगे बढ़ाने के लिए प्रेरित करता है। यह कहना है कि जिले के अधिकारियों और प्रबुद्ध लोगों का। जो अपना पहला गुरु अभिभावकों को ही मानते हैं। इन अफसरों के जीवन में भी किसी न किसी ने मार्ग प्रशस्त करके बदलाव दिया है। अब ये भी अपनी सेवाओं से दूसरों के लिए रास्ते खोल रहे हैं या उनके जीवन को आसान बनाने का प्रयास कर रहे हैं। पढ़ें गुरु पूर्णिमा के अवसर पर अमर उजाला की विशेष प्रस्तुति।
कभी गुरु बनकर दी सीख, आज समाज को दिशा दे रहे एसडीएम
करनाल के एसडीएम अनुभव मेहता मूल रूप से सिरसा के रहने वाले हैं। वे अपने जीवन का गुरु माता-पिता को मानते हैं। उनका कहना है कि अभिभावकों ने ही हमेशा मानवता की भलाई और आगे बढ़ने की सीख दी। इसी राह पर वे चल रहे हैं। पटियाला की थापर यूनिवर्सिटी से बीटेक मैकेनिकल में पढ़ाई करने के बाद उन्होंने कई वर्ष तक बीसीईटी गुरदासपुर पंजाब के इंजीनियरिंग कॉलेज में बतौर सहायक प्राध्यापक सेवाएं दीं। उनके पढ़ाए कई विद्यार्थी आज उच्च पदों पर हैं। तब उन्होंने गुरु बनकर सीख दी थी, 2004 में एचसीएस की परीक्षा पास करने के बाद से समाज को दिशा दे रहे हैं। कई जिलों में प्रशासनिक पदों पर सेवाएं दे चुके हैं।
जिसके पास गुरु है वह कभी नहीं हारता
डीएसपी हेड क्वार्टर नायब सिंह ने बताया कि अध्यापक ही गुरु नहीं होते, जो आपका मार्गदर्शन करते हैं, जीवन में आगे बढ़ने की प्रेरणा देते हैं, आपको सिखाते हैं वो सभी गुरु होते हैं। आपके अधिकारी भी गुरु होते हैं, माता-पिता भी गुरु होते हैं। उनके डांटने पर हमें बुरा नहीं मानना चाहिए। भगवान से मिलने का माध्यम भी गुरु ही होते हैं। जिसके पास गुरु होता है वह जीवन में हारता नहीं, आगे बढ़ता जाता है। अभिभावक प्रथम गुरु ही माने जाते हैं, जीवन उन्हीं ने दिया है। इसलिए अपने अभिभावकों का भी सम्मान करना चाहिए।
मेरी सफलता पर लोग मां से पूछते थे क्या खिलाती हो
न्यायाधीश डॉ. नीलिमा शांगला अपनी प्रथम गुरु मां रानी सिंगला को ही मानती हैं। उन्होंने बताया कि जिन्होंने मुझे अच्छा संसार दिया। मां की प्रेरणा से ही में स्कूल और कॉलेज में हमेशा अव्वल रहती थी। मेरी मां से लोग पूछते थे कि नीलिमा को क्या खिलाती हो। मां ने ही हमेशा लोगों की मदद और सहयोग करने और गोमाता की सेवा करने की प्रेरणा दी। उन्हीं की प्रेरणा से में जज बनीं। मां हमेशा हनुमान चालीसा का पाठ पढ़ाती थीं तो दूसरे गुरु हनुमान जी बने, उसके बाद स्वामी मुक्तानंद महाराज गुरु हैं जिनसे मुझे प्रेरणा मिलती है।
रोल मॉडल होना चाहिए गुरु
कल्पना चावला राजकीय मेडिकल कॉलेज के निदेशक डॉ. एमके गर्ग का कहना है कि गुरु को रोल मॉडल होना चाहिए। वह सिर्फ किताबी ज्ञान देने तक सीमित न हो। उसे बच्चों को संस्कार भी देने चाहिए। वे स्वयं एक शिक्षक के तौर पर अपने बच्चों को कहते हैं कि वे जिंदगी में इतनी ऊंचाइयों पर पहुंचें कि जब वे मिलना चाहें तो कोई उन्हें वेटिंग हॉल में बैठाए और कहे कि अभी मीटिंग में व्यस्त हैं तो आपको कुछ देर इंतजार करना पड़ेगा। यही उनकी गुरु दक्षिणा होगी।
मां का दिया ज्ञान आया काम, मिली कामयाबी
जिला खेल अधिकारी सुधा भसीन का कहना है कि मैंने बचपन में अपनी मां को ही अपना गुरु मान लिया था। उन्हीं से सीखा कि गुरु के बिना ज्ञान नहीं। दुनिया का पहला पाठ अपनी मां से ही सीखा। अपने माता-पिता की इकलौती बेटी होने के कारण में सदा उनकी लाडली रही हूं। परिवार में भाई-बहन न होने के कारण शुरुआत से ही खेलों में रुचि रही है। अभिभावकों ने भी खेल की हर स्पर्धा में भाग लेने का मौका दिया और कभी नहीं रोका। मां की प्रेरणा ने कामयाबी को ऊंची उड़ान दी। राष्ट्रीय स्तर पर बेहतर एथलीट रहकर अब जिला खेल अधिकारी का मुकाम पाया है, जिससे काफी संतुष्ट व खुश हूं।