शहादत के तीन माह बाद होनी थी प्रवेश की शादी
- 1971 के युद्ध में कुर्बानी देने वाले दादा से मिली थी देश सेवा की प्रेरणा
संवाद न्यूज एजेंसी
इंद्री। कारगिल युद्ध का जिक्र होते ही ग्रामीणों को जांबाज 21 वर्षीय प्रवेश की याद आ जाती है। करीब दो महीने से भी अधिक समय तक चले युद्ध में 34वें दिन प्रवेश कुमार अपनी बटालियन के साथ दुश्मनों से लड़ता हुआ छह जून 1999 को शहीद हो गया था। करीब तीन महीने बाद प्रवेश की शादी होनी थी। पिता रामेश्वर दास ने कहा कि उनका बेटा देश की रक्षा के लिए काम आया जिसका उन्हें फख्र है।
हालांकि परिजनों को इस बात का मलाल है कि सरकार ने परिवार को गैस एजेंसी, करनाल बस स्टैंड पर दुकान, गांव में पुस्तकालय व शहीद प्रवेश के नाम पर सड़क बनाने की घोषणा की थी लेकिन 23 वर्षों के बाद भी कुछ नहीं मिला।
प्रवेश कुमार के नाम पर सरकार ने गांव में एक पुस्तकालय खोलने की घोषणा की थी। सरकार की ओर से पुस्तकालय का भवन तैयार करने के बाद उसमें आंगनबाड़ी केंद्र खोल दिया गया। ग्रामीणों ने आवाज उठाई तो आंगनबाड़ी केंद्र को बंद कर दिया गया लेकिन दशकों बाद भी भवन में सरकार की ओर से एक भी पुस्तक नहीं भेजी गई।
नहीं मिल पाया दादा का पार्थिव शरीर
ऐसा नहीं है कि प्रवेश कुमार अपने परिवार में एकमात्र शहीद थे। इससे पूर्व उनके दादा महावीर सिंह भी सेना में रहकर सरहद की रक्षा के लिए अपने प्राण न्यौछावर कर चुके हैं। परिजनों का कहना है कि दादा महावीर सिंह 1971 की लड़ाई में शहीद हो गए थे। परिवार को उनका शव भी प्राप्त नहीं हुआ था। सेना की ओर से केवल उनका ट्रंक भेजा गया था। प्रवेश को भी सेना में जाने की प्रेरणा दादा से ही मिली थी इसलिए 10वीं कक्षा की पढ़ाई पूरी करते ही वह सेना में चला गया था।