करनाल। अब अधिक ईंधन देने वाली गन्ने की प्रजातियां ईजाद की जाएंगी। इसके लिए गन्ना प्रजनन संस्थान के वैज्ञानिक शोध में जुटे हुए हैं। गन्ने से ईंधन (बैगास) अभी भी प्राप्त होता है मगर वैज्ञानिक अब इस बात पर जोर दे रहे हैं कि इस ईंधन की मात्रा अपेक्षाकृत और बढ़े।
वििभन्न औद्योगिक इकाइयों और प्लांटों में गन्ने के वेस्ट से बनने वाले इस ईंधन की बढ़ती मांग के मद्देनजर इस तरह की प्रजातियों पर शोध किया जा रहा है।
पिछले कुछ समय से थर्मल प्लांटों, पेपर उद्योग, प्लाईवुड व हाईड्रोजन गैस प्लांटों इत्यादि औद्योगिक इकाइयों में गन्ने से निकलने वाले ईंधन की खपत ज्यादा बढ़ी है। गन्ना प्रजनन संस्थान कोयंबटूर आैर करनाल के वैज्ञानिक मिलकर यह शोध कर रहे हैं।
इस तरह की प्रजातियों को एनर्जी केन की श्रेणी मंे रखा जात है। किसानों द्वारा खेतों में पैदा किए जाने वाला गन्ना अब सिर्फ गुड़, शीरा या चीनी ही नहीं बनाता, इससे सामान्य जीवन में उपयोग होने वाली विभिन्न वस्तुओं का निर्माण किया जाने लगा है।
देश में पेट्रोल की जरूरत लगातार बढ़ रही है, जिसमें केंद्र सरकार अब इथेनॉल मिलाने लगा है, जिसकी मात्रा अब और बढ़ाने वाली है। जो गन्ने के शीरे से बनाया जाता है। इथेनाॅल गन्ने की उन्हीं प्रजातियों से अधिक बनता है, जो अधिक चीनी वाली होती हैं, इसके लिए सीओ-0238, सीओ-0118 आदि कई प्रजातियां हैं। गन्ना प्रजनन संस्थान के क्षेत्रीय अनुसंधान केंद्र करनाल के वरिष्ठ वैज्ञानिक डॉ. एसके पांडेय ने बताया कि अब ऐसी प्रजातियों पर भी लगातार शोध चल रहा है, जिन्हें एनर्जी केन कहा जाता है, क्योंकि ऐसी किस्मों में चीनी रिकवरी भले ही कम हो, लेकिन बॉयोमॉस (बैगास आदि) अत्यधिक होता है। ऐसी कुछ किस्मों पर करनाल क्षेत्रीय गन्ना अनुसंधान केंद्र पर भी शोध कार्य चल रहा है। इसका बड़ा फायदा ये होगा कि गन्ने की ये किस्में बिजली उत्पादन में महत्वपूर्ण भूमिका निभाएंगी।
डॉ. एसके पांडेय ने बताया कि गन्ने के बैगास आदि से पेपर बनने लगा है। इससे उच्च गुणवत्ता वाले प्लाईवुड बोर्ड आदि का निर्माण होगा। इसका सीधा उपयोग बॉयोरिफाइनरी में होगा और हाईड्रोजन गैस उत्पादन में भी किया जाएगा।
भोजन के बाद थाली, प्लेट, चम्मच भी खा सकेंगे
जिस थाली, प्लेट, कटोरी और चम्मच से हम लोग भोजन करते हैं, आने वाले दिनों में भोजन के बाद उन थाली, प्लेट, चम्मच आदि को भी खा लिया जाएगा। यूं तो ये तकनीक पहले ही विकसित की जा चुकी हैं, कुछ संस्थानों, कंपनियों ने गेहूं के भूसे आदि से ऐसे खाद्य बर्तन बनाए हैं, लेकिन अब ऐसे बर्तनों को गन्ने के बैगास आदि से बनाने की तकनीक पर गन्ना प्रजनन संस्थान कोयंबटूर व करनाल ने काम शुरू कर दिया है। इसके लिए गन्ना प्रजनन संस्थान कोयंबटूर, दोगावरी इंडस्ट्री कर्नाटक, करूर में तमिलनाडु पेपर मिल, केपीआईटी टेक्नोलॉजी पुणे (महाराष्ट्र) आदि के सहयोग से इस तकनीक पर शोध कार्य किया जा रहा है। इसके बाद ही गन्ने से जैम, जैली, आइसक्रीम, सीरप आदि भी अधिक मात्रा में बनेंगे।
भोजन के बाद थाली, प्लेट, चम्मच भी खा सकेंगे
जिस थाली, प्लेट, कटोरी और चम्मच से हम लोग भोजन करते हैं, आने वाले दिनों में भोजन के बाद उन थाली, प्लेट, चम्मच आदि को भी खा लिया जाएगा। यूं तो ये तकनीक पहले ही विकसित की जा चुकी हैं, कुछ संस्थानों, कंपनियों ने गेहूं के भूसे आदि से ऐसे खाद्य बर्तन बनाए हैं, लेकिन अब ऐसे बर्तनों को गन्ने के बैगास आदि से बनाने की तकनीक पर गन्ना प्रजनन संस्थान कोयंबटूर व करनाल ने काम शुरू कर दिया है। इसके लिए गन्ना प्रजनन संस्थान कोयंबटूर, दोगावरी इंडस्ट्री कर्नाटक, करूर में तमिलनाडु पेपर मिल, केपीआईटी टेक्नोलॉजी पुणे (महाराष्ट्र) आदि के सहयोग से इस तकनीक पर शोध कार्य किया जा रहा है। इसके बाद ही गन्ने से जैम, जैली, आइसक्रीम, सीरप आदि भी अधिक मात्रा में बनेंगे।