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स्ट्राबेरी की खेती कर नरूखेड़ी के दलबीर बने मिसाल

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file foto - फोटो : AMAR UJALA
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फोटो-307 22 साल से स्ट्राबेरी की खेती कर क्षेत्र में चमकाया नाम - नरूखेड़ी गांव के लघु किसान दलबीर सिंह बने मिसाल मीनू बांगड़ करनाल। लघु एवं सीमांत किसान जहां खेती को घाटे का सौदा समझकर इससे मुंह फेर लेते हैं, वहीं इस अवधारणा को तोडऩे वाले धरतीपुत्र भी हैं जिन्होंने लीक से हटकर काम करके दिखाया। गेहूं-धान के परंपरागत फसल चक्र से हटकर खेती की और अच्छा मुनाफा लेकर खुशहाल जीवन जीने की राह प्रशस्त की। इन्हीं किसानों में से एक हैं नरूखेड़ी गांव के किसान दलबीर सिंह। दलबीर सिंह ने 22 साल पहले गेहूं-धान की खेती को छोड़ स्ट्राबेरी का उत्पादन शुरू किया। अनुभव मिलता गया और धीरे-धीरे एक एकड़ से तीन एकड़ तक स्ट्राबेरी की खेती करने लगे। जिले में वह पहले ऐसे किसान हैं जो निरंतर स्ट्राबेरी की खेती कर रहे हैं। ड्रिप इरीगेशन प्रणाली से इस खेती में ना केवल पानी की बचत होती है बल्कि अच्छा मुनाफा भी ले रहे हैं। बकौल दलबीर सिंह एक एकड़ में चार फुट चौड़े बैड बनाकर बीच में एक फुट स्पेस छोड़ा जाता है। बैड पर मल्चिंग करके सितंबर के महीने में स्ट्राबेरी की पौध की रोपाई की जाती है। एक एकड़ में 25 से 30 हजार तक पौधे लगते हैं। स्ट्राबेरी की पौध हिमाचल के राजगढ़ से दो से पांच रुपये तक प्रति पौधा तक खरीदकर लाते हैं। कई बार महाराष्ट्र से भी पौध मंगवाई है। खेत में मल्चिंग पर करीब 12 हजार रुपये तक खर्च होता है। ढाई से तीन महीने में पौधा फल देने लगता है। अच्छी देखरेख हो तो प्रति पौधा एक से डेढ़ किलो तक फल प्राप्त होते हैं। नवंबर व दिसंबर में 700 से 800 रुपये प्रति किलो तक स्ट्राबेरी का भाव मिल जाता है। यह उपज दिल्ली की आजादपुर सब्जी मंडी में बिक्री के लिए भेजते हैं। इस समय भाव 50 रुपये किलो तक आ जाता है। अब यहां के वातावरण में गर्मी होने के कारण फसल समाप्त हो चुक ी है। स्ट्राबेरी के मल्चिंग वाले बैड पर उन्होंने खरबूजे की बिजाई कर दी। इस पर बीज के अलावा कोई खर्च ही नहीं आया और अगली फसल भी जल्द से जल्द मिलेगी। तमाम खर्च काटकर स्ट्राबेरी उत्पादन में प्रति एकड़ 1.50 लाख रुपये तक बचत हो जाती है। उन्होंने बताया कि खुद मेहनत करे सारा काम निपटाते हैं। कुछ श्रमिक भी इस काम में लगाने पड़ते हैं। इस खेती से वह कभी जीवन में कर्ज के झंझट में नहीं पड़े और दो एकड़ जमीन भी खरीदी है। मेहनत के बल पर परिवार का गुजर-बसर अच्छा हो जाता है। उनका आज के युवाओं को संदेश है कि अपने वतन में भी सबकुछ है, बस केवल मेहनत करने वाला होना चाहिये। -----
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