करनाल। अब माइकोराइजा तकनीक से क्षारीय और लवणीय मिट्टी की सेहत सुधारी जा सकेगी। केंद्रीय मृदा लवणता अनुसंधान संस्थान (सीएसएसआरआई) करनाल को इसमें प्रारंभिक सफलता मिली है। केंद्रीय विज्ञान और प्रौद्योगिकी विभाग के विज्ञान और इंजीनियरिंग अनुसंधान बोर्ड के वित्त पोषण में केंद्रीय मृदा लवणता अनुसंधान संस्थान में माइकोराइजा जैव उर्वरक पर यह परियोजना शुरू की गई है।
परियोजना की अन्वेषक डॉ प्रियंका चंद्रा ने बताया कि कवक और पौधों की जड़ों के बीच के सहजीवी संबंध को माइकोराइजा कहा जाता है। ये संबंध लगभग 95 प्रतिशत पौधों में पाया जाता है। ये कवक पौधों को अनेक प्रकार से फायदा पहुचाते हैं। इस सहजीवी संबंध में कवक, पोषक पौधे से शर्करा, विटामिंस व अमीनो अम्ल प्राप्त करता है। मृदा से पौधों के लिए पोषक तत्व जैसे फास्फोरस और सूक्ष्म पोषक तत्वों को ग्रहण करने में मदद करता है, जो फसलों की पैदावार बढ़ाते हैं। क्षारीयता की स्थिति में जब मिट्टी की भौतिक संरचना खराब हो जाती है, पोषक तत्वों की उपलब्धता व अवशोषण कम हो जाता है। ऐसे में माइकोराइजा मृदा से नाइट्रोजन, फास्फोरस तथा पोटेशियम आदि का अवशोषण करने में सहायक होते हैं, जिस पर सीएसएसआरआई में शोध किया जा रहा है। इसमें डॉ. प्रियंका चंद्रा, डॉ.अरविंद कुमार राय, डॉ.निर्मलेंदु बसक, डॉ.पारुल सुंधा, डॉ. कैलाश प्रजापत व निदेशक एवं वैज्ञानिक डॉ. आरके यादव शोध कर रहे हैं।
ये मृदा की उर्वरा शक्ति को बढ़ाते हैं
- माइकोराइजा पौधों द्वारा जल अवशोषण की क्रिया को बढ़ाते हुए उन्हें सूखे तथा लवणता की परिस्थिति के प्रतिरोधी बनाते हैं। इसे प्राकृतिक जैव उर्वरक भी कहते हैं। ये रोग उत्पन्न करने वाले सूक्ष्म जीवों से भी पौधे को सुरक्षा प्रदान करते हैं। माइकोराइजा के कवक तन्तु पौधों की जड़ की सतह पर फैले रहने के साथ ही मृदा की गहराई में भी प्रवेश कर जाते हैं. यह विभिन्न प्रकार के एन्जाइम्स के स्राव और मृदा में मौजूद कार्बनिक पदार्थों को घुलनशील बना कर खुद उपयोग करते हैं, जिससे मृदा की उर्वरा शक्ति बढ़ती है।
डॉ. आरके यादव, निदेशक,केंद्रीय मृदा लवणता अनुसंधान संस्थान (सीएसएसआरआई) करनाल।
प्रथमदृष्टया आशाजनक रहे हैं परिणाम
- लवण प्रभावित मृदाओं में ज्वार एवं गेहूं पर माइकोराइजा का मूल्यांकन के लिए अनुसंधान किए जा रहे हैं। इन फसलों में उपयोग से पहले लिए माइकोराइजा के कल्चर का मक्का की जड़ों में उपनिवेशण कर गुणन किया गया। प्रारंभिक परिणाम माइकोराइजा उपचारित पौधों में बेहतर वृद्धि एवं विकास के साथ ही फॉस्फोरस के ग्रहण में भी वृद्धि हुई है और माइकोराइजा से पौधों में लवणता के दुष्प्रभाव कम हुए हैं, ये परिणाम आशाजनक हैं।
डॉ.अरविंद कुमार राय, अध्यक्ष, मृदा एवं फसल प्रबंधन विभाग, सीएसएसआरआई करनाल।
माइकोराइजा उत्पादन के लिए इकाई स्थापित
- माइकोराइजा जैव उर्वरक के उत्पादन के लिए एक इकाई स्थापित की है, जहां शोध किया जाएगा। माइकोराइजा जैव उर्वरक की क्षमता के मूल्यांकन के लिए पंजाब एवं हरियाणा के लवण प्रभावित क्षेत्रों में किसानों को वितरित भी किया गया है। माइकोराइजा विभिन्न प्रकार के पेड़-पौधे, सब्जियों,धान, दलहनी एवं चारे वाली फसलों के लिए लाभदायक साबित हुए हैं। हालांकि बाजारों में माइकोराइजा उपलब्ध है लेकिन महंगा है, इसे पृथक करने की तकनीक कठिन है। अब सीएसएसआरआई में इसके पृथक एवं उत्पादन से संबंधित शोध की शुरुआत की गई है।
डॉ. प्रियंका चंद्रा, परियोजना अन्वेषक, सीएसएसआरआई करनाल।
इस विधि से किसान बनाएं माइकोराइजा
- मिट्टी को तीन चार दिनों तक फर्श या प्लास्टिक चादर पर सुखाएं। फिर गमलों, ट्रे या पॉलिथीन बैग में भर कर मिट्टी में प्रारंभिक माइकोराइजा कल्चर डालकर अच्छी तरह से मिला लें। प्रारंभिक माइकोराइजा किसी भी कृषि विश्वविद्यालय व कृषि संस्थान प्रयोगशाला से प्राप्त किया जा सकता है। गमले में ज्वार या मक्का की बिजाई कर दें। नमी बनाए रखने के लिए गमलों में आवश्यकतानुसार सिंचाई करते रहें। इस प्रकार पौधों को लगभग ढाई से तीन महीने तक सामान्य रूप से बढ़ने दें। फिर गमले से धीरे-धीरे जड़ों को निकाल लें। ये जड़ें माइकोराइजा युक्त होती हैं। माइकोराइजा के तंतु व बीजाणु जड़ के भीतर एवं जड़ों के ऊपरी सतह पर तथा मिट्टी में विकसित हो जाते हैं। जड़ों को पानी में न धोएं तथा सामान्य तापमान पर छाया में सुखाएं। सूखी हुई जड़ों को एक सेमी आकार के छोटे-छोटे टुकड़ों में काट लेंगे एवं इसे वर्मी कंपोस्ट या गमले की मिट्टी के साथ मिला लें। इस प्रकार माइकोराइजा युक्त कल्चर इस्तेमाल के लिए तैयार हो जाता है। इसे साफ प्लास्टिक थैली में भरकर सामान्य तापमान पर छह महीने तक संरक्षित रख सकते हैं।