करनाल। पॉक्सो एक्ट के तहत दर्ज मामलों में त्वरित कार्रवाई के लिए केंद्र सरकार की ओर से गठित फास्ट ट्रैक अदालतें जनवरी-2023 तक महज 8909 मामले ही निपटा पाईं। जबकि देशभर की अदालतों में इस तिथि तक दो लाख 43 हजार 237 मामले लंबित थे। ऐसे में अगले तीन साल में इन केसों का निस्तारण आसान नहीं है। इस संबंध में इंडिया चाइल्ड प्रोटेक्शन फंड (आईसीपीएफ) की ओर से तैयार रिपोर्ट को एमडीडी ऑफ इंडिया (एनजीओ) ने जारी किया है। देश में ऐसी 758 विशेष अदालतें हैं।
अदालतों में पॉक्सो एक्ट के मुकदमों को जल्द निस्तारित करने के लिए केंद्र सरकार की ओर से 2019 में विशेष फास्ट ट्रैक अदालतों का गठन किया गया था, जिसका कार्यकाल 2026 तक है। रिपोर्ट के अनुसार, प्रत्येक फास्ट ट्रैक स्पेशल अदालत ने साल भर में औसतन सिर्फ 28 मामलों का निपटारा किया, जबकि प्रत्येक विशेष अदालत से हर साल कम से कम 165 मामलों के निपटारे की उम्मीद थी। ऐसे में लंबित मामलों की संख्या लगातार बढ़ती जा रही है। आईसीपीएफ का कहना है कि लंबित मामलों के निपटारे के लिए अदालतों की संख्या भी 758 से बढ़ाने की जरूरत है। आईसीपीएफ और एमडीडी ऑफ इंडिया ‘बाल विवाह मुक्त भारत’ कार्यक्रम के सहयोगी संगठन हैं, जिसकी ओर से जारी आंकड़े एनसीआरबी में भी दर्ज हैं।
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दावा : हरियाणा को पांच, अरुणाचल प्रदेश को 30 साल लगेंगे
रिपोर्ट में लंबित मामलों के आधार पर दावा किया गया है कि हरियाणा की पॉक्सो अदालतों में जनवरी 2023 तक 4688 मामले हैं, जिन्हें निपटाने में पांच साल लगेंगे, यानी 2028 तक ही न्याय मिल पाएगा। जबकि जनवरी 2023 तक के पॉक्सो के लंबित मामलों के निपटारे में अरुणाचल प्रदेश को 30 साल लगेंगे। वहीं दिल्ली को 27, पश्चिम बंगाल को 25, मेघालय को 21, बिहार को 26 और उत्तर प्रदेश को 22 साल लगेंगे।
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जल्द न्याय ही पीड़ा से छुटकारा : एमडीडी
सीडब्ल्यूसी के पूर्व चेयरमैन एवं एमडीडी ऑफ इंडिया के अध्यक्ष सुरेंद्र सिंह मान का कहना है कि रिपोर्ट विधि एवं कानून मंत्रालय, महिला एवं बाल विकास मंत्रालय एवं राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो से मिले आंकड़ों पर आधारित है। पीड़ित परिवारों को न्याय की तलाश में अक्सर असहनीय कठिनाइयों और दुश्वारियों का सामना करना पड़ता है। यह उन पर ढाए गए अत्याचारों और पीड़ा को रोजाना याद करने के समान है। जल्द न्याय ही उन्हें इस पीड़ा से छुटकारा दिलाने का एकमात्र रास्ता है। इसके लिए वे सीडब्ल्यूसी व इनसे जुड़ी संस्थाओं और विभागों को भी पत्र लिख चुके हैं।
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मामलों की निगरानी के लिए बने फ्रेमवर्क : आईसीपीएफ
आईसीपीएफ के संस्थापक भुवन ऋभु का कहना है कि अगर पीड़ित बच्चों को बचाना है तो जरूरी है कि बच्चों और उनके परिवारों को सुरक्षा मिले, उनके पुनर्वास और क्षतिपूर्ति के इंतजाम हों और निचली अदालतों से लेकर हाई कोर्ट और सुप्रीम कोर्ट जैसी ऊपरी अदालतों तक मुकदमे का समयबद्ध निपटारा सुनिश्चित हो। इसके लिए सभी फास्ट ट्रैक विशेष अदालतें संचालन में हों, वे कितने मामलों का निपटारा कर रहे हैं, इसकी निगरानी के लिए एक फ्रेमवर्क हो। अदालतों से संबद्ध पुलिस से लेकर जजों और पूरे अदालती स्टाफ को सिर्फ इन्हीं अदालतों के काम के लिए रखा जाए।