विश्व के 34 अफ्रीकी एवं एशियाई देशों में भूमि व भूमिगत जल में बढ़ती लवणता और क्षारीयता बड़ा खतरा बन रही है, जिससे भूमि बंजर होने की ओर अग्रसर है। अब करनाल स्थित केंद्रीय मृदा एवं लवणता अनुसंधान संस्थान (सीएसएसआरआई) की ओर से विकसित तकनीक, प्रौद्योगिकी और लवण सहनशील फसलों की किस्मों से ये देश अपनी भूमि और भूमिगत जल की गुणवत्ता सुधारेंगे। ये भारतीय तकनीक अब तक 25 देशों तक पहुंच चुकी है, अब सात और देशों को तकनीक का प्रशिक्षण दिया जा रहा है।
भारत में करीब 67.4 लाख हेक्टेयर भूमि लवणता और क्षारीय से प्रभावित है, वहीं अफ्रीकी एवं एशियाई 34 देशों में लाखों हेक्टेयर भूमि और भूमिगत जल में लवणता और क्षारीयता बढ़ रही है, जिससे यहां की भूमि भी बंजर होने की ओर अग्रसर है। जिसने इन देशों की चिंता बढ़ा दी है। इस पर एक अंतरराष्ट्रीय संस्था अफ्रीकी-एशियाई ग्रामीण विकास संगठन (एएआरडीओ) यानी आरडू ने अपने सभी 34 सदस्य देशों को लवण एवं क्षारीयता प्रभावित भूमि व भूमिगत निम्न गुणवत्ता वाले जल के सुधार के लिए करनाल स्थित सीएसएसआरआई की ओर से विकसित भूमि एवं जल सुधार तकनीक का प्रशिक्षण दिलाने का अनुबंध किया है। ये प्रशिक्षण पिछले 13 सालों से चल रहा है। अब तक 25 देशों के 100 वैज्ञानिकों, कृषि विशेषज्ञों को इस तकनीक का प्रशिक्षण दिया जा चुका है।
सीएसएसआरआई करनाल के निदेशक डॉ. आरके यादव ने बताया कि अब 15 नवंबर को प्रशिक्षण प्राप्त करने के लिए सात देशों में जिनमें बांग्लादेश, श्रीलंका, माॅरीशस, केन्या, जाम्बिया, जाॅर्डन और एस्वातिनी शामिल हैं, से नौ विदेशी वैज्ञानिक व कृषि विशेषज्ञ अधिकारी संस्थान में पहुंचे हैं। जिन्हें तकनीकों का प्रशिक्षण दिया जा रहा है। विदेशी वैज्ञानिकों को देश में स्थित कई अनुसंधान केंद्रों, क्षेत्रीय केंद्रों का भ्रमण भी कराया जा रहा है। खेतों में ले जाकर भूमि व निम्न स्तर के भूमिगत जल की जांच का तरीका भी सिखाया जा रहा है। इनके सुधार की प्रणालियों व तकनीकों को दिखाकर सुधारात्मक गतिविधियों को सिखाया जा रहा है। लवणता व क्षारीयता सहनशील फसलों की किस्मों के बारे में भी जानकारी दी जा रही है।
क्या है तकनीक
सीएसएसआरआई करनाल की ओर से विकसित तकनीकों में क्षारीय भूमि के सुधार के लिए जिप्सम, सल्फर, एफजीडी जिप्सम तकनीक है तो लवणीय भूमि के सुधार के लिए सब सरफेस ड्रेनेज, ड्रेनज तकनीक और लवण सहनसील फसलों की किस्में, उनके बीज हैं तो निम्न गुणवत्ता वाले जल के सुधार के लिए जिप्सम बेड, जिप्सम ब्रेकेट्स व रैपिड एसिडूलेरिंग मैटेरियल और कल्चर आदि कई तकनीक, प्रौद्योगिकी व विधियां शामिल हैं।
भूमि व जल में लवणता और क्षारीयता भारत में ही नहीं बल्कि विश्व के कई देशों में बढ़ रही है। भारत में 67.4 लाख हेक्टेयर भूमि इससे प्रभावित है। इसी तरह से विश्व के कई देशों में ये स्थिति बढ़ रही है, इसे नहीं सुधारा गया तो मिट्टी खराब हो जाएगी और फसलों की पैदावार कम होती चली जाएगी। हर देश में भूमि व जल में लवणता व क्षारीयता की स्थिति अलग-अलग है। सीएसएसआरआई के वैज्ञानिक तकनीक व प्रौद्योगिकी का प्रशिक्षण दे रहे हैं, लेकिन यदि किसी देश को लवण सहनशील फसलों के बीज चाहिए तो वहां की सरकार को भारत सरकार से बातचीत करनी होगी, तभी बीज मिल पाएंगे, संस्थान सीधे बीज नहीं दे सकता।
- डॉ. आरके यादव, निदेशक, केंद्रीय मृदा एवं लवणता अनुसंधान संस्थान, करनाल।