करनाल। ग्रामीण बेरोजगार युवाओं के लिए मधुमक्खी पालन, रोजगार का एक उत्कृष्ट स्रोत है। इसके लिए युवाओं को आगे आना चाहिए। ये विचार राष्ट्रीय डेयरी अनुसंधान संस्थान के जिला कृषि विज्ञान केंद्र में आयोजित चार दिवसीय मधु मक्खी पालन प्रशिक्षण शिविर के अंतिम दिन अध्यक्ष डॉ. पंकज सारस्वत ने व्यक्त किए। शिविर में करनाल व आसपास के जिलों के 52 किसानों को मधुमक्खी पालन का प्रशिक्षण दिया गया।
एनडीआरआई के कृषि विज्ञान केंद्र के अध्यक्ष डॉ. पंकज सारस्वत ने बताया कि संस्थान के निदेशक डॉ. धीर सिंह के मार्ग दर्शन में चार दिवसीय मधु मक्खी पालन प्रशिक्षण कार्यक्रम 25 से 28 अप्रैल तक आयोजित किया गया। इसका विषय “मधु मक्खी पालन : आय सर्जन का एक अतिरिक्त साधन” रखा गया था। उन्होंने कहा कि इसमें निवेश बहुत कम होता है और कृषि के विभिन्न आयामों के साथ कोई स्पर्धा भी नही होती है। विषय विशेषज्ञ, (मधु मख्खी-पालन) डॉ. राकेश कुमार टोंक ने मधु मक्खी पालन की वैज्ञानिक विधियों जैसे मधुमक्खी के बक्सों का रख-रखाव, वर्ष भर उत्पादन लेने के लिए मधुमक्खी बक्सो का बी-फ्लोरा की उपलब्धता के अनुसार माइग्रेशन, रानी मधुमक्खी को बनाने की तकनीक और मधुमक्खी कॉलोनी की संख्या बढ़ाने के बारे मेंबताया। डॉ. टोंक ने कहा कि मधु मक्खी पालन से शहद के साथ साथ प्राकृतिक-मोम (बी वैक्स), प्रोपॉलिश, रॉयल जेली, बी पोलन, और बी वेनम भी मिलता है, जिनसे भी किसानों को अच्छी आय प्राप्त होती है। ये आयुर्वेदिक दवाइयों और कॉस्मेटिक इंडस्ट्री में बहुत ज्यादा इस्तेमाल होता है। बाजार मूल्य अच्छा मिलता है। मधुमक्खी पालन बहुत कम लागत में प्रारंभ किया जा सकता है। भूमिहीन बेरोजगार ग्रामीण युवा इस कार्य की ओर अधिक आकर्षित भी हो रहे हैं। मौसम वैज्ञानिक डॉ. योगेश कुमार ने अलग-अलग मौसम में मधु मक्खी की कॉलोनियों की देखभाल के तरीके बताए तो डॉ अरुण कुमार ने शहद के गुणों और इसकी गुणवत्ता के परीक्षण की जानकारी दी।