हरियाणा की अनाज मंडियों में मंडी शुल्क और एचआरडीएफ अधिक होने के कारण अब राज्य के राइस मिलर्स, चावल निर्यातकों और बड़े आढ़तियों ने उत्तर प्रदेश और दिल्ली आदि की मंडियों का रुख कर लिया है। बासमती की 1509 धान की प्रजाति की इन दिनों बंपर खरीदारी हो रही है, लेकिन करनाल सहित हरियाणा की विभिन्न मंडियों में इसकी आवक घट गई है। इसका मुख्य कारण यह बताया जा रहा है कि उत्तर प्रदेश के सहारनपुर जिले की गंगोह अनाज मंडी सहित विभिन्न मंडियों में इस धान की काफी खरीदारी हो रही है। इसमें करनाल सहित हरियाणा के विभिन्न जिलों के राइस मिलर्स, चावल कारोबारी आदि यूपी में जाकर धान खरीदते हैं, क्योंकि वहां सिर्फ एक प्रतिशत मंडी शुल्क और आधा प्रतिशत विकास सेस लिया जाता है, कुल डेढ़ प्रतिशत शुल्क देना पड़ता है।
जब केंद्र सरकार ने तीन कृषि कानूनों को लागू किया था तो हरियाणा सरकार ने भी आधा प्रतिशत मंडी शुल्क और आधा प्रतिशत ही हरियाणा ग्रामीण विकास फंड (एचआरडीएफ) यानी कुल शुल्क एक प्रतिशत कर दिया था, लेकिन जैसे ही किसान आंदोलन के कारण तीन कृषि कानूनों को वापस लेने का एलान किया गया तो दोनों शुल्कों को बढ़ाकर दो-दो प्रतिशत यानी कुल शुल्क चार प्रतिशत कर दिया गया है। शुरुआती दौर में जुलाई और अगस्त माह के दौरान बासमती की प्रजाति 1509 करनाल सहित हरियाणा के कई अनाज मंडियों में बड़ी संख्या में पहुंची, उसकी खरीदारी भी हुई लेकिन इसके भाव पिछले साल की अपक्षा डेढ़ गुना तक बढ़ गए। पिछले साल 2400-2500 रुपये प्रति क्विंटल था जो इस साल 3600 से 4000 रुपये प्रति क्विंटल तक बिक रहा है। इसमें चार प्रतिशत शुल्क जोड़ने के बाद छोटे खरीदारों व आढ़तियों को नुकसान होने लगा। शुल्क से बचने के लिए आढ़तियों व चावल कारोबारियों ने बीच का रास्ता निकाला और उत्तर प्रदेश की अनाज मंडियों में जाकर धान खरीदना शुरू कर दिया है। गंगोह अनाज मंडी हरियाणा की सीमावर्ती होने व बासमती की बेल्ट होने के कारण यहां से खरीदारी सर्वाधिक हो रही है।
यूपी की मंडियों से धान खरीदने का लाभ
सबसे पहले लाभ तो ढाई प्रतिशत शुल्क की बचत ही है, क्योंकि हरियाणा की मंडियों में एचआरडीएफ व मंडी शुल्क चार प्रतिशत है, जबकि यूपी की मंडियों में डेढ़ प्रतिशत है। दूसरा सबसे बड़ा फायदा यह है कि यहां राइस मिलर्स, चावल कारोबारियों, आढ़तियों से यूपी यानी सीमांत राज्यों के किसानों से सीधे संपर्क स्थापित हो रहे हैं। यूपी से हरियाणा धान लाने पर कोई पाबंदी नहीं है, बिना टैक्स चोरी के एक नंबर में कारोबार हो जाता है, क्योंकि हरियाणा में द्वितीय खरीद पर कोई शुल्क नहीं है। किसानों को यूपी से धान लेकर हरियाणा की मंडियों तक नहीं आना पड़ता है, हरियाणा के आढ़ती, व्यापारी वहीं मिल जाते हैं।
हरियाणा सरकार से मंडी शुल्क व एचआरडीएफ को घटाकर एक से डेढ़ प्रतिशत किए जाने की मांग पिछले साल से ही चल रही है, क्योंकि इससे हरियाणा की मंडियों को भारी नुकसान हो रहा है। हरियाणा चावल निर्यातक व राइस मिलर्स इन दिनों उत्तर प्रदेश की मंडियों में जाकर कारोबार कर रहे हैं। वहां से धान खरीदकर हरियाणा में ला रहे है, जिससे हरियाणा की मंडियों को शुल्क का भारी नुकसान हो रहा है। सरकार को तत्काल शुल्क कम करना चाहिए।
- रजनीश चौधरी, चेयरमैन हरियाणा अनाज मंडी आढ़ती एसोसिएशन हरियाणा
--
जब-जब टैक्स घटा है, तो राजस्व बढ़ा है। हम विश्वास दिलाते हैं कि सरकार यदि मंडी शुल्क व एचआरडीएफ को घटाकर एक से दो प्रतिशत तक भी करती है, तो राजस्व घटेगा नहीं, क्योंकि फिर किसी को टैक्स चोरी करने की जरूरत नहीं रहती है। माल अधिक खरीदा जाता है, सरकार का राजस्व स्वत: बढ़ जाता है। अन्यथा तो अभी 1509 के बाद 1121, 1718, आरएस-10, सुगंध, डुप्लीकेट, 1401 आदि कई प्रजातियों की धान आएगी, बाहर से खरीद होती तो सरकार को ही नुकसान होगा।
- विनोद गोयल, वरिष्ठ उप प्रधान, हरियाणा राइस मिलर्स एंड डीलर्स एसोसिएशन हरियाणा