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Karnal News: पशुओं के डीएनए में आवश्यकतानुसार हो सकेगा आनुवांशिक बदलाव

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पशुओं के डीएनए में आवश्यकतानुसार हो सकेगा आनुवांशिक बदलाव
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- ''जीनोम एडिटिंग प्रौद्योगिकी'' से पशुओं के नस्ल में सुधार, उत्पादकता बढ़ाने व उनके व्यवहार में परिवर्तन होगा संभव
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माई सिटी रिपोर्टर
करनाल। ''जीनोम एडिटिंग'' यानी डीएनए के जीन में बदलाव। जिसके माध्यम से पशुओं को अपने देश की जलवायु के मुताबिक अनुकूल बनाया जा सकता है। भविष्य में पशुओं के नस्ल सुधार, दुग्ध, मांस एवं पशुओं की उत्पादकता बढ़ाने, उनकी रोग प्रतिरोधक क्षमता में वृद्धि करने के साथ-साथ उनके व्यवहार में परिवर्तन संभव हो सकेगा।
जर्मनी के एमएलआई-इंस्टीट्यूट ऑफ फार्म एनीमल जेनेटिक्स के प्रो. विल्फ्रेड ए. कुज ने राष्ट्रीय डेयरी अनुसंधान संस्थान (एनडीआरआई) में देश के पशुओं से जुड़े शोध संस्थानों के वैज्ञानिकों को इस तकनीक की कुछ अन्य नई दिशाओं व प्रगति पर विचार साझा किए।
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राष्ट्रीय डेयरी अनुसंधान संस्थान करनाल के निदेशक एवं कुलपति डॉ. धीर सिंह के निर्देशन में पशुधन में ''जीनोम एडिटिंग प्रौद्योगिकी'' विषय पर सात दिवसीय कार्यशाला आयोजित की गई। इसका आयोजन राष्ट्रीय कृषि उच्च शिक्षा परियोजना (एनएएचईपी) की संस्थागत विकास योजना (आईडीपी) के तहत सात से 13 अगस्त तक किया गया। जिसमें उन्नत क्षेत्र को सीखने के लिए विभिन्न संस्थानों के विशेषज्ञ, शोधकर्ता और युवा छात्रों को शामिल किया गया था। वैज्ञानिकों के मंथन के बाद ये कहा गया कि ''जीनोम एडिटिंग'' एक महत्वपूर्ण तकनीक के रूप में उभरा है, जो वांछित लक्षण उत्पन्न करने के लिए पशु आनुवंशिकी संशोधन को सक्षम बनाता है।
संयुक्त निदेशक (शोध) डॉ. राजन शर्मा ने देश के वैज्ञानिक विकास में उन्नत प्रौद्योगिकी में दक्षता के साथ शोधकर्ताओं को सशक्त बनाने में इसकी भूमिका पर बात रखी तो कार्यशाला के समन्वयक डॉ. मनोज कुमार सिंह और डॉ. नरेश सेलोकर ने प्रतिभागियों को ''जीनोम एडिटिंग'' विधियों के बारे में बताया।
इसमें एनडीआरआई के शोधकर्ताओ एवं विद्यार्थियों के साथ साथ भारतीय पशु चिकित्सा अनुसंधान संस्थान बरेली, केंद्रीय बकरी अनुसंधान संस्थान मथुरा, राष्ट्रीय पशु पोषण और शरीर क्रिया विज्ञान संस्थान बैंगलुरू, गुरु अंगद देव पशु चिकित्सा और पशु विज्ञान विश्वविद्यालय पंजाब आदि के कुल 43 प्रतिभागियों ने भाग लिया।
पशुओं में क्रांति के तौर पर किया जा सकेगा इस्तेमाल
जर्मनी के प्रो. विल्फ्रेड ए. कुज ने ''जीनोम एडिटिंग प्रौद्योगिकी'' के भविष्य को रेखांकित करते हुए कहा कि इसे पशुओं में क्रांति के तौर पर इस्तेमाल किया जा सकता है। जलवायु परिवर्तन के बीच पशुओं की ताप सहनशीलता को लेकर दुनिया चिंतित है, लेकिन इस प्रौद्योगिकी से नई राहें प्रशस्त होंगी। वैज्ञानिकों ने कहा कि डीएनए के जीन में आवश्यकतानुसार आनुवंशिक परिवर्तन संभव हो गया है। चाहे दूध व मीट बढ़ाना हो या फिर पशुओं की उत्पादकता व रोग प्रतिरोधक क्षमता। ताप सहनशील बनाना हो या फिर उनके व्यवहार में परिवर्तन लाना हो, नस्ल सुधार हो या जरूरत के मुताबिक उनके जीन में कई और बदलाव करना हो, इस तकनीक में सभी कुछ संभव है। ''जीनोम एडिटिंग प्रौद्योगिकी'' में नवीनतम प्रगति और सहायक प्रजनन तकनीक के साथ उनके एकीकरण पर जोर दिया गया।
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पशु विकास की चुनौतियों का सामना करने में मिलेगी मदद
एनडीआरआई के निदेशक डॉ. धीर सिंह ने कहा कि आने वाले दशकों में मानव और पशु विकास की चुनौतियों का सामना करने में ''जीनोम एडिटिंग'' की महत्वपूर्ण भूमिका होगी। उन्होंने डेयरी पशु उत्पादन और स्वास्थ्य की बेहतरी के लिए इस तकनीक के उपयोग में एनडीआरआई की सक्रिय भूमिका पर चर्चा की। केंद्रीय जैव प्रौद्योगिकी विभाग नई दिल्ली के पूर्व सलाहकार, डॉ. एके. रावत ने पशुधन वृद्धि, रोग प्रबंधन और चिकित्सीय उपचारों में विकास को बढ़ावा देने के लिए ''जीनोम एडिटिंग'' में कुशल शोधकर्ताओं की तत्काल आवश्यकता को रेखांकित किया।
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