माई सिटी रिपोर्टर
करनाल। स्वतंत्रता संग्राम सेनानी यानी हरियाणा के गांधी की सोमवार को पुण्य तिथि है। आजादी की लड़ाई में उन्होंने अपना अहम योगदान तो दिया ही, स्वतंत्र भारत में भी उन्होंने अन्याय के खिलाफ जंग जारी रखी। मुजारे की जमीन के लिए उन्होंने आंदोलन किया और मुस्लिम जमींदारों को उनकी छीनी गई जमीन को वापस कराया है। वह तीन बार विधायक रहते हरियाणा सरकार में हर बार मंत्री और एक बार सांसद रहे। 12 सितंबर 1997 को उन्होंने दुनिया को अलविदा कह दिया। उनकी स्मृति में अगस्त 2015 में उन्हें जन्म दिवस समारोह के अवसर पर हरियाणा सरकार ने उनके सम्मान में आईटीआई करनाल का नामकरण बाबू मूल चंद जैन आईटीआई रखा। डाक व तार विभाग हरियाणा के रोहतक पोस्टल डिवीजन ने अक्तूबर 2021 में उनके नाम पर एक डाक टिकट व विशेष आवरण जारी किया। जिसका टाइटल था हरियाणा के गांधी।
स्वतंत्रता संग्राम सेनानी मूल चंद का जन्म 20 अगस्त 1915 को रोहतक जिले के ग्राम सिकंदरपुर माजरा में एक जैन परिवार में हुआ। माता का नाम धनकौर और पिता का नाम लाला मुरारीलाल जैन था। गाव के प्राइमरी स्कूल के बाद उन्होंने मैट्रिक की परीक्षा 1921 गोहाना हाई स्कूल से पास की। 1947 में वकालत पास की। लॉ कॉलेज में पूरी की। 1936 में यूनिवर्सिटी परीक्षा में सारे पंजाब में फर्स्ट आए। इस परीक्षा में इन्हें गोल्ड मेडल मिला। पंडित नेहरू की अंग्रेजी में प्रकाशित आत्मकथा को अपनी जेब खर्च से खरीदा, उसे पढ़कर वह काफी प्रभावित हुए। गोहाना में वकालत शुरू की। उन्हीं दिनों इन्होंने आजादी के आंदोलनों में सरगमी से भाग लेना शुरू कर दिया। खद्दर पहनना शुरू कर दिया। गोहाना नगर कांग्रेस कमेटी के प्रधान बने।
1940 में महात्मा गांधी ने व्यक्तिगत सत्याग्रह का आंदोलन छेड़ दिया। इसमें भाग लेने के लिए व्यक्ति को पहले गांधी जी से अनुमति लेनी पड़ती थी। कई शर्तें थी, जिनका एक फार्म भरना पड़ता था। मूलचंद जैन शुरू से ही गांधीवादी विचारों के थे। वह इसमें शामिल हुए। छह मार्च 1941 को उन्होंने अपनी जन्मभूमि ग्राम माजरा में सत्याग्रह शुरू किया। यहीं से उन्हें भाषण देते समय उन्हें गिरफ्तार कर रोहतक जेल में भेज दिया। एक साल कैद की सजा मिली। उन्हें भी सितंबर 1941 में रिहा कर दिया गया। 1942 में वह परिवार की अनुमति मिलने पर एक जनवरी को करनाल आ गए। इसके बाद यहीं रहने लगे।
कुछ महीनों बाद गांधी जी ने नया आंदोलन छेड़ने का संकेत दिया। जिसमें यह भी कहा गया कि नया आंदोलन भारत की आजादी के लिए अंतिम आंदोलन होगा। उन दिनों जर्मनी व यूरोप में युद्ध चल रहा था, नेहरू सहित कई नेता ऐसे समय में आंदोलन शुरू करने के पक्ष में नहीं थे। लेकिन यह बात गांधी जी को पता लगी तो उन्हें अच्छा नहीं लगा और उन्होंने पंडित नेहरू को वर्धा बुलाया। आठ अगस्त 1942 को मुंबई में ऑल इंडिया कांग्रेस की कमेटी की बैठक बुलाकर भारत छोड़ो आंदोलन प्रस्ताव पास किया गया, लेकिन उसी रात मुंबई में ही सभी बड़े नेताओं को गिरफ्तार कर लिया गया। जगह जगह रेल पटरियां उखाड़ने या काटने व अन्य तोड़-फोड़ शुरू हो गई। मूलचंद जैन को भी 11 अगस्त को करनाल कचहरी में गिरफ्तार कर लिया गया। यही वह दौर था, टोपी पहनने पर पाबंदी लगाने की बात हुई। 13 सितंबर 1943 को अचानक उन्हें रिहा कर दिया। आंदोलनात्मक गतिविधियां चलती रहीं। 30 जनवरी 1948 को गांधी जी की हत्या कर दी गई। उनके दाह संस्कार के समय दिल्ली में मूलचंद जैन भी पत्नी के साथ शामिल हुए।
छुआछूत खत्म करने पर किया काम
देश आजाद होने के अगले साल 1949 में करनाल जिले में एक और समस्या आ गई। जिले में काफी बड़े मुस्लिम जमींदार थे, जिन्हें मुजारे की भूमि (बटाई पर ली जाने वाली भूमि) कहा जाता था। उनकी जमीन को पाकिस्तान से आए छोटे जमीदारों को देना शुरू कर दिया और उन्हें उजाड़ा जाने लगा। कांग्रेसी होते हुए जैन ने इसके विरुद्ध आंदोलन किया। आखिरकार आंदोलन को सफलता मिली और जिन पुराने मुजारों से उनकी काश्त भूमि छीन ली गई थी, उन्हें पांच-पांच एकड़ तक वापस कर दी गई। 1952 में भारत में पहले चुनाव में जैन समालखा से कांग्रेस टिकट पर विधायक बने। इसके बाद उन्होंने समाज से छुआछूत और जातपात के भेदभाव को खत्म करने के लिए कई कार्य किए। उन्हें 1989 में उत्तर भारत स्वतंत्रता सेनानी परिषद का सर्वसम्मति से प्रधान बनाया गया।