सन 1930 में स्वतंत्रता सेनानियों को बराड़ा रेलवे स्टेशन पर स्टाफ ने पिलाई थी लस्सी
बीहटा में ठहराए थे सेनानी तो गांव के पंचों को निलंबित कर चलाया गया था उन पर केस
मोहित धुपड़ करनाल। बात सन 1930 की है। नमक सत्याग्रह आंदोलन चल रहा था। स्वतंत्रता सेनानियों का एक जत्था गांव-दर-गांव जाकर भारतीयाें को अंग्रेजों के खिलाफ लामबंद कर स्वतंत्रता आंदोलन में भाग लेने का आह्वान करता था।
उसके बाद ये लोग अंग्रेजों के बनाए कानूनों को तोड़ते थे और फिर अपनी गिरफ्तारियां देते थे। आजादी के इन मतवालों में भगतराम शुक्ला, लाल द्वारिका नाथ, लाला मुंशी राम, लाला ज्योति प्रकाश, चौधरी दीनामल, ठाकुर रतन सिंह, चौधरी कुंदन सिंह, लाला पारसनाथ, लाला सीताराम, खान अब्दुल गफ्फार खान, लाला दुनीचंद अंबालवी का जत्था उन दिनों हरियाणा के विभिन्न गांवों में आजादी के लिए आंदोलन की अलख जगा रहा था।
जत्था अंबाला के गांव बीहटा पहुंचा और वहां इन स्वतंत्रता सेनानियों ने गांव की चौपाल पर अंग्रेजों के खिलाफ भाषण देते हुए लोगों को अपने साथ मिलने को कहा। उस वक्त गांव के पांच पंच ठाकुर मंगल सिंह, करतार सिंह, बड़मल, गुज्जर सिंह व कपूर सिंह इन स्वतंत्रता सेनानियों से बहुत ज्यादा प्रभावित थे और उन्होंने आजादी की इस लड़ाई में पूरा सहयोग देने का आश्वासन दिया। पंचों ने इन स्वतंत्रता सेनानियों को बीहटा गांव में ही रात के समय गुपचुप ढंग से ठहराया और सुबह केसरी रेलवे स्टेशन पर उन्हें जगाधरी के लिए ट्रेन में बैठा दिया।
ट्रेन जब बराड़ा रेलवे स्टेशन पर पहुंची, तो स्वतंत्रता सेनानियों ने वहां रेलवे के स्टाफ से भी आंदोलन में भाग लेने का आह्वान किया। इस पर वहां तैनात स्टेशन मास्टर बाबू शालीग्राम, सहायक स्टेशन मास्टर कर्णदास और टेलीग्राफ क्लर्क बद्रीनाथ ने उन सेनानियों से प्रभावित होकर स्टेशन पर ही सभी को लस्सी पिलवाई।बीहटा गांव में स्वतंत्रता सेनानियों का ठहराव और बराड़ा रेलवे स्टेशन पर उन्हें रेलवे स्टाफ द्वारा लस्सी परोसे जानी की सूचना तत्कालीन अंबाला के डीसी (अंग्रेज अफसर) को मिल गई। इस पर डीसी इतने नाराज हुए कि उन्होंने बीहटा के पांचों पंचों और लस्सी पिलाने वाले रेलवे स्टाफ को तत्काल निलंबित कर उन पर ब्रिटिश हुकूमत से गद्दारी करने के आरोप में मुकदमा दर्ज करवा दिया।
इतिहासविद डॉ. यूवी सिंह बताते हैं कि इस संग्राम से जुड़े भारत सरकार के गोपनीय दस्तावेजों में भी इसका जिक्र है। उनके अनुसार, आजादी के मतवालों की ये टोली उन दिनों गांवों का भ्रमण कर लोगों को जोड़ती थी। रिकॉर्ड के मुताबिक, अंग्रेजों के बनाए कानून तोड़कर 200 स्वतंत्रता सेनानियों ने गिरफ्तारियां दी थी। डॉ. यूवी सिंह के अनुसार स्वतंत्रता सेनानियों की मदद करने वाले लोगों पर इसी तरह मुकदमे दर्ज कर अंग्रेज अफसर उन्हें काफी प्रताड़ना देते थे ताकि कोई अन्य उनकी मदद न कर सके।