करनाल। दिवाली हो या गणेश पूजन, अब प्राकृतिक एवं जैविक पूजा होगी। राष्ट्रीय डेयरी अनुसंधान संस्थान (एनडीआरआई) के वैज्ञानिकों ने देसी गायों के गोबर से जहां दिवाली के लिए सुगंधित विशेष दीये तैयार किए हैं, वहीं गोमय गणेश भी। जी, हां ये गणेश प्रतिमाएं देसी गोबर (गोमय) से निर्मित हैं, जो पानी के संपर्क में आते ही चंद मिनटों में अंतरध्यान होकर प्रकृति को भी पोषित करेंगी। यही नहीं दीयों आदि को गमलों, क्यारियों में डालने पर खाद बनकर पौधों को पल्लवित करेंगे।
एनडीआरआई के पशु शरीर क्रिया विज्ञान विभाग के अध्यक्ष डॉ. अजय कुमार डांग ने बताया कि इन गोमय निर्मित दीयों से सिर्फ रोशनी ही नहीं बल्कि सकारात्मक ऊर्जा भी मिलेगी। वातावरण की शुद्धता होगी। ये कार्बन का कोई निशान छोड़े बिना जैविक खाद में बदल जाते हैं। भविष्य में इन दीयों में सरसों, मेथी, मूली, गाजर, जामुन, नीम, नीबू, संतरा, आम आदि मौसमी सब्जियों व फलों आदि के बीच में डाले जाएंगे, ताकि ये जहां भी जाएंगे, वहीं प्रकृति को एक नया पौधा देंगे और पक्षियों के भी काम आएंगे। ऐसे में दिवाली के दीये, अब जहां तहां फेंके नहीं जाएंगे। यज्ञ हवन आदि के लिए देसी गाय को गोबर के उपले और संभरनी की सुगंध घरों और वातावरण को महकाएगी।
प्रतिमाओं में भरेंगे आस्था के रंग
छोटा दीया दो रुपये (डेढ़ इंच), बड़ा दीया (छह इंच) पांच रुपये, मध्य दीया (ढाई इंच) तीन रुपये का है। बिना पेंट श्री गणेश प्रतिमा की कीमत 130 रुपये रखी गई है। दीये व प्रतिमाओं में रंग इसलिए नहीं भरा गया है, क्योंकि जो व्यक्ति उसे ले जाएगा, वह उसमें हल्दी, गेरू, चूना, रोली, चावल का आटा आदि से अपनी आस्था के रंग भरेगा। गोमय निर्मित श्री गणेश (छोटी प्रतिमा) दो प्रकार की हैं, हुक वाली प्रतिमाओं को कार में टांगा जा सकता है और बिना हुक वाली छोटी प्रतिमाओं को डैस बोर्ड या मंदिर में रखा जा सकता है।
मोहन जोदड़ो हो या हड़प्पा सभ्यता, खोदाई में मिले हजारों साल पहले के मिट्टी के बर्तन और प्रतिमाएं ये साबित करने के लिए काफी हैं कि मिट्टी को अधिक तापमान पर तपाकर यदि कोई प्रतिमा या दीया बनाया जाता है तो वह लंबे समय तक मिट्टी में नहीं मिल पाता है और मिट्टी की उर्वरा शक्ति के लिए पत्थर के रूप में मौजूद रहकर नुकसान पहुंचाते हैं। देश में करोड़ों क्विंटल मिट्टी के दीये व बर्तन व अन्य उत्पाद बनते हैं। इन्हें कम से कम 900 डिग्री सेल्सियस पर तपाया जाता है, जिससे ये मिट्टी हमेशा के लिए खराब हो जाती है, लेकिन एनडीआरआई के इस कार्य से देश में लोगों में जागरूकता आएगी और लोग पर्यावरणीय संरक्षण से जुड़ेंगे। दूसरी सबसे बड़ी बात ये है कि त्योहार हो या फिर आस्थागत पूजा-अर्चना, पूजा स्थल व कच्चे घरों की गोबर से लिपाई करने की प्राचीन प्रथा रही है। इसी को ध्यान में रखते हुए पुरातन साहित्य में वर्णित तथ्यों पर वैज्ञानिकों ने प्रथम पूज्य श्री गणेश की प्रतिमाएं, दिवाली के दीये, संभरनी व उपले आदि तैयार किए हैं।
- डॉ. आशुतोष, प्रधान वैज्ञानिक, जलवायु परिवर्तन परियोजना, एनडीआरआई
वर्जन
दिवाली के मौके पर इनकी बिक्री शुरू करा दी गई है। सभी नागरिकों से अपील है कि गोमय से निर्मित उत्पादों का दिवाली के अवसर पर प्रयोग करके पर्यावरण संरक्षण में अपनी भागीदारी सुनिश्चित करें। इस आशय की पूर्ति के लिए संस्थान ने इन गोमय उत्पादों की बिक्री के लिए संस्थान परिसर में प्रबंध किया है।
--डॉ. धीर सिंह, निदेशक राष्ट्रीय डेयरी अनुसंधान संस्थान, करनाल
Fragrant Gomay Diyas and Ganesh idols will be illuminated on Diwali