करनाल। बंगाली कालोनी में शनिवार की रात से दुर्गा पूजा का शुभारंभ हुआ। चार दिन तक चलने वाली पूजा के लिए नैनीताल से ब्राह्मणों को बुलाया गया है, वहीं पूजा के समय बजने वाले ढाक भी कोलकता से बुलवाए गए हैं। करनाल दुर्गा पूजा के प्रधान संतोष कर ने बताया कि क ोरोना काल के बाद इस बार दुर्गा पूजा पूरे जोरों शोरों से मनाई जाएगी।
पंडाल में पूजा करने के लिए श्रद्धालु अंजना दास, साथी पाल, नितिका शाह, शिवानी दास, सुधा बरमन, ज्योति पाल, दीपा अधिकारी रोजाना मां दुर्गा के लिए छह प्रकार की सब्जी, छह प्रकार की मिठाई और अष्टमी के दिन हलवा पूरी और छोले की सब्जी बना मां दुर्गा को भोग लगवाती हैं। दुर्गा पूजा के दौरान रोजाना दोपहर को भंडारे का आयोजन किया जाएगा। शनिवार को दुर्गा पूजा का शुभारंभ पार्षद सरिता कालड़ा ने किया। दुर्गा पूजा में पहुंचे पंडित वापी गांगुली और चंदन गांगुली ने बताया कि दुर्गा पूजा के पहले दिन अकाल बोधन किया जाता है।
ये दुर्गा पूजा का पहला दिन है। इस दिन मंत्रों के माध्यम से देवी को जगाया जाता है। बिल्वपत्र के पेड़ की पूजा कर देवी को आने के लिए निमंत्रित किया जाता है। दुर्गा पूजा के पहले दिन को कल्पारंभ भी कहते हैं, जिसका अर्थ है सृष्टि की शुरूआत का पहला दिन।
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नवपत्रिका पूजा
ये दुर्गा पूजा का दूसरा दिन होता है, जो नवरात्र की सप्तमी तिथि पर मनाया जाता है। इस दिन नौ तरह के पेड़ की पत्तियों को मिलाकर एक गुच्छा बनाया जाता है, इसका उपयोग देवी की पूजा में किया जाता है। इसलिए इसे नवपत्रिका पूजा कहते हैं। इनमें केला, हल्दी, दारू हल्दी, जयंती, बिल्व पत्र, अनार, अशोक, चावल और अमलतास के पत्ते होते हैं। इस दिन लड़कियां व महिलाएं पीले कपड़े पहनकर पांडालों में आती हैं।
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धुनुची नृत्य
नवरात्रि की अष्टमी और नवमी तिथि पर खास तरह के दुर्गा पांडालों में किया जाता है, जिसे धुनुची नृत्यहो कहा जाता है। इसे शक्ति नृत्य भी कहा जाता है। धुनुची (एक मिट्टी का बर्तन) में नारियल की जटा, जलते कोयले और हवन सामग्री रखकर नृत्यु किया जाता है और मां की आरती भी इसी से की जाती है। ये नृत्य और आरती बहुत ही खास तरीके से की जाती है।
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सिंदूर खेला और मूर्ति विसर्जन
ये दुर्गा पूजा का अंतिम दिन होता है। सिंदूर खेला उत्सव विजयादशमी पर मनाया जाता है। इस दिन महिलाएं एक-दूसरे को सिंदूर लगाती हैं और ये कामना करती हैं कि उनकी सुख-समृद्धि की कामना करती हैं। इसी दिन देवी प्रतिमाओं का विसर्जन भी किया जाता है। इसके बाद सभी लोग एक-दूसरे के घर जाकर शुभकामनाएं और मिठाईयां देते हैं