माई सिटी रिपोर्टर
करनाल। पशु क्लोनिंग के क्षेत्र में एक बार फिर राष्ट्रीय डेयरी अनुसंधान संस्थान (एनडीआरआई) ने पहली गाय की क्लोन और दुनिया की पहली गिर नस्ल की गाय की क्लोन पैदा की है। इसका नाम सोमवार को भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद (आईसीएआर) के महानिदेशक डॉ. हिमांशु पाठक ने गंगा रखा है। इसे जलवायु परिवर्तन के बीच पशु और दुग्ध उत्पादन में क्रांति माना जा रहा है।
एनडीआरआई करनाल ने भैंस की क्लोन गरिमा 2009 में तैयार की थी जलवायु परिवर्तन के बीच ऐसी प्रजातियों की जरूरत महसूस हुई जो गर्मी और ठंड को सहन करे और दुग्ध उत्पादन में सहायक हो।
एनडीआरआई के निदेशक डॉ.धीर सिंह ने बताया कि देसी गायों में सतत दुग्ध उत्पादन के लिए एक बड़ी चुनौती है। इसके लिए उच्च गुणवत्ता वाली देसी गायों पर क्लोनिंग तकनीक से शुरू की है। इस दिशा में 2021 में उत्तराखंड लाइवस्टॉक डेवलपमेंट बोर्ड देहरादून के सहयोग से एनडीआरआई करनाल के पूर्व निदेशक डॉ. एमएस चौहान के नेतृत्व में गिर, साहीवाल और रेड-सिंधी गायों की क्लोनिंग का काम शुरू किया। इसके सरंक्षण और संख्या वृद्धि के लिए पशु क्लोनिंग तकनीक विकसित करना चुनौतीपूर्ण कार्य रहा है, लेकिन इसमें 16 मार्च को उस समय सफलता मिली जब गिर नस्ल की एक क्लोन बछड़ी पैदा हुई। जन्म के समय इसका वजन 32 किलोग्राम था। स्वदेशी गिर गाय की नस्ल मूलतः गुजरात में है।
इस नस्ल का उपयोग दूसरी नस्लों की गुणवत्ता सुधारने में होगा। गिर गाय अधिक सहनशील होती है, जो अधिक तापमान और ठंड सहन कर लेती है। विभिन्न ऊष्ण कटिबंध के प्रति भी रोग प्रतिरोधक है। इसलिए इसकी ब्राजील, अमेरिका, मैक्सिको और वेनेजुएला में मांग है। वैज्ञानिकों के टीम लीडर डॉ. नरेश सेलोकर, मनोज कुमार सिंह, अजय असवाल, एसएस लठवाल, सुभाष कुमार, रंजीत वर्मा, कार्तिकेय पटेल और एमएस चौहान शामिल हैं। उन्होंने दो साल में स्वदेशी विधि विकसित करके क्लोन तैयार किया है।
यह है विधि
इसमें अल्ट्रासाउंड और निर्देशित सुइयों का उपयोग कर पशु से अंडाणु लेते हैं। अनुकूल परिस्थिति में 24 घंटे तक परिपक्व करने के बाद उच्च गुणवत्ता वाली गाय की दैहिक कोशिकाओं का उपयोगदाता के रूप में होता है। जो व्युत्पन्न अंडाणु (ओपीयू) से जोड़ा जाता है। आठ दिन के इन विट्रो-कल्चर के बाद विकसित भ्रूण (ब्लास्टोसिस्ट) को किसी भी गाय में स्थानांतरित करते हैं। इसके नौ महीने बाद क्लोन बछड़ा या बछड़ी होता है। गिर किस्म की क्लोनिंग में साहीवाल किस्म की गाय से अंडा लिया, गिर किस्म का सेल (डीएनए) लिया और परखनली में भ्रूण तैयार करके फिर संकर प्रजाति की गाय में रोपित किया।
मवेशी क्लोनिंग के लिए एक स्वदेशी पद्धति विकसित करने पर एनडीआरआई की टीम बधाई की पात्र है। ये टीम प्रौद्योगिकी के शोधन के लिए अपना शोध जारी रखेगी और अधिक उत्पादन करेगी। मवेशी क्लोनिंग प्रौद्योगिकी में भारतीय किसानों के लिए अधिक दूध देने वाले स्वदेशी मवेशियों की आवश्यकता को पूरा करने की क्षमता है।
- डॉ. हिमांशु पाठक, महानिदेशक, आईसीएआर और सचिव आईसीएआर
अधिक तापमान और ठंड सहनशील प्रजाति गिर का क्लोन तैयार किया है। एनडीआरआई की ये तकनीक सफल रही है। इससे उच्च गुणवत्ता वाली नस्लों पैदा करने में सफलता मिलेगी। दुग्ध उत्पादन बढ़ेगा, खासकर बुल (साड़ों) की कमी दूर होगी। भारत में मवेशियों की क्लोनिंग के लिए अनुसंधान गतिविधियों का विस्तार करने और शुरू करने में मदद मिलेगी। हमारे वैज्ञानिकों ने पशु क्लोनिंग तकनीक से गुणवत्ता पूर्ण देसी पशुओं के उत्पादन में नए आयाम स्थापित किए हैं।
- डॉ धीर सिंह, एनडीआरआई, करनाल
एनडीआरआई में 2009 में टीम ने क्लोन तकनीक से भैंस की क्लोन गरिमा को पैदा किया था। भैंस के 16 क्लोन तैयार हैं। अब 16 मार्च को गाय का पहला क्लोन पैदा हुआ। यह भारत में गाय का पहला और दुनिया में गिर प्रजाति का पहला क्लोन है।
- डॉ. नरेश सेलोकर, प्रभारी भ्रूण प्रौद्योगिकी टीम, एनडीआरआई, करनाल