करनाल। चोटीबेधक कीट अब पहले से भी खतरनाक हो गया है। क्षेत्रीय गन्ना अनुसंधान केंद्र में शोध के बाद कीट के और शक्तिशाली होने की जानकारी सामने आई है। मौसम प्रतिरोधी क्षमता विकसित करने के कारण अब इस कीट की सभी छह पीढ़ियां गन्ने को नुकसान पहुंचा सकती हैं। ऐसे में जो किसान अभी तक इसकी रोकथाम जून-जुलाई में करते थे, उन्हें पहली पीढ़ी यानी बिजाई के बाद पत्तियां आते ही रोकथाम शुरू करनी होगी।
क्षेत्रीय गन्ना अनुसंधान केंद्र करनाल के अध्यक्ष डॉ. एसके पांडेय ने बताया कि वसंतकालीन गन्ने में फरवरी से नवंबर तक चोटीबेधक कीट की छह पीढ़ियां आती हैं। अब तक तापमान बढ़ने पर तीसरी पीढ़ी जून और जुलाई में गन्ने को भारी नुकसान पहुंचाती थी। पिछले पेराई सत्र में हरियाणा में 70 से 80 प्रतिशत, उत्तर प्रदेश में 20 से 40 प्रतिशत, उत्तराखंड में 30 से 50 प्रतिशत, पंजाब में 30 से 35 प्रतिशत नुकसान 40 प्रतिशत खेतों में देखा गया था। कीट पर शोध में पाया गया है कि अब इसकी सभी छह पीढ़ियां प्रतिरोधक क्षमता विकसित करने के कारण प्रभावशाली हो रही हैं, जिसके कारण अब सभी छह पीढ़ियां गन्ने को नुकसान पहुंचा सकती हैं।
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कैसे फैलती है कीट की पीढ़ियां
- शरदकालीन गन्ने के जमाव के घनत्व व पेड़ी और नई फसल में अंकुरों पर मादा कीट अंडे देती हैं। एक मादा एक पत्ती पर एक स्थान पर 250 से 300 अंडे देती है। निषेचन के छह दिन बाद सूड़ियां बन जाती हैं, जो गन्ने के पौधे के अंदर चली जाती हैं। ये पत्तियों की मध्यनाड़ी में सुरंग बनाकर अंदर जाती हैं। सबसे खास बात तो ये है कि एक सूड़ी एक गन्ने में जाती है, अब तक एक गन्ने में दूसरी सूड़ी नहीं देखी गई। इसलिए जितनी सूड़ी, उतने गन्ने प्रभावित होते हैं।
कैसे करें बचाव
- डॉ. एसके पांडेय ने बताया कि ये कीट गन्ने की पत्तियों पर सुबह सात या आठ बजे तक दिखते हैं। बाद में छिप जाते हैं, इसलिए इन्हें सुबह आठ बजे से पहले पत्तियों पर ही पकड़ना होगा। पत्तियों के ऊपर अंडों का जमाव (ब्राउन रंग का अंड समूह) दिखे तो हाथों से पत्तियां तोड़ लें और अलग ले जाकर जला दें।
- दूसरा उपाय ये है कि खेत में लाइट लगाएं, उसके नीचे गड्ढा खोदकर पानी भरें, या ट्यूबवेल के पास पानी भरे गड्ढे पर लाइट लगाएं। रात को लाइट जला दें, जिसमें गिरकर नर और मादा मर जाएंगे।
- फेरोमोन ट्रैप (जाल) के जरिये रोकथाम करें। चोटीबेधक मादा एक विशेष प्रकार का हार्मोन छोड़ती है, जिसकी गंध से नर कीट आकर्षित होता है। अब वैज्ञानिकों ने इसी गंध वाला सिंथेटिक केमिकल बना लिया है। इसे अलग-अलग डालने पर नर कीट भ्रमित हो जाता है, मादा के संपर्क में नहीं आ पाता, तब तक निषेचन अवधि बीत जाती है।
- इसके लिए किसान ईमिडा क्लोफ्रिड आदि अंतरप्रवाही कीटनाशक का प्रयोग कर सकते हैं। ट्राइकोग्रामा जपोनिकम को भी खेत में छोड़ें। इससे अन्य छिद्रक कीटों से भी बचाव होगा।
-पिछले साल चोटीबेधक कीट ने गन्ने को भारी नुकसान पहुंचाया था। इसके बाद क्षेत्रीय गन्ना अनुसंधान केंद्र के वैज्ञानिकों ने उत्तर भारत के विभिन्न राज्यों में जाकर किसानों, वैज्ञानिकों, चीनी मिलों में जाकर प्रशिक्षण दिया है। अब चोटीबेधक की सभी पीढ़ियां गन्ने के लिए घातक हो रही हैं, इसलिए किसानों को अब जून जुलाई की बजाय बिजाई के बाद गन्ने में पत्तियां आने, पेड़ी की शुरुआत से ही सावधान रहना होगा। इसके लिए किसानों को लगातार जागरूक किया जा रहा है।
- डॉ.एसके पांडेय, अध्यक्ष, क्षेत्रीय गन्ना अनुसंधान केंद्र करनाल। (फोटो-1007)
आंध्र प्रदेश की पंगास क्षेत्रवासियों को आ रही रास
फोटो-3 व 4
आंध्र प्रदेश की पंगास क्षेत्रवासियों को आ रही रास
-जिले के ही करीब 15 किसान कर रहे इस मछली का पालन
राेहू, कतला और मिरगल की जगह लोग कर रहे पसंद
सुरेश सैनी
यमुनानगर। अब तक क्षेत्र में राेहू, कतला, मिरगल, सिल्वर कार्प, ग्रास कार्प और कॉमन कार्प प्रजातियों की मछली का पालन होता आया है, लेकिन अब आंध्र प्रदेश की पंगास मछली ने इनकी जगह लेनी शुरू कर दी है। पंगास आज मीठे पानी में पाली जाने वाली दुनिया की तीसरी सबसे बड़ी प्रजाति है। यह प्रजाति 6-8 माह में एक से डेढ़ किग्रा की हो जाती है तथा वायुश्वासी होने के कारण कम घुलित ऑक्सीजन को सहन करने की क्षमता रखती है। भारत में आंध्रप्रदेश पंगास का सबसे बड़ा उत्पादक राज्य है। वहीं अब इसका पालन यमुनानगर और हरियाणा के अन्य क्षेत्रों में भी बढ़ने लगा है।
मत्स्य विभाग के अनुसार जिले में करीब 15 फार्मर ऐसे हैं जो पंगास मछली का पालन कर रहे हैं। इनमें तीन से चार फार्मर खुद के तालाब में और बाकी फार्मर पंचायती जोहड़ में पालन कर रहे हैं। यह मछली सौ रुपये किलो से कम नहीं बिकती, इसलिए इस मछली की मांग ज्यादा होती है और यह मछली केवल गर्मी के सीजन में ही पाली जा सकती है। पंगास मछली का पालन करने के लिए तालाब का क्षेत्रफल करीब 0.5 से 1.0 एकड़ होना चाहिए। वहीं करीब 10 से 15 एकड़ तक का क्षेत्रफल भी ठीक रहता है। तालाब में पानी की गहराई करीब 1.5 से 2.0 मी. तक होनी चाहिए, इसके लिए ज्यादा गहराई वाले तालाब ठीक नहीं रहते हैं, क्योंकि यह मछली वायुश्वासी होती है। तालाब की गहराई ज्यादा न हो, क्योंकि इन्हें ऊपर आने और जाने में ज्यादा ऊर्जा खपत करनी होती है जिससे इनकी वृद्धि दर कम होने लगती है।
वर्जन
आंध्र प्रदेश में पाई जाने वाली पंगास मछली की अब यहां डिमांड बढ़ने लगी है। इस मछली की खास बात ये है यह बिना कांटे की होती है। इन मछलियों की वार्षिक वृद्धि दर ज्यादा होती है। जिले के सात-आठ फार्मर ऐसे हैं जो इसका पालन कर रहे हैं। भारतीय मुख्य कार्प के साथ इसे आसानी से पाल सकते हैं।
-अजय सिन्हा, जिला मत्स्य अधिकारी।