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कैंसर दिवसः महिलाओं को सबसे ज्यादा इस बीमारी का खतरा, शुरू में पता लगे तो ही इलाज संभव

Tue, 04 Feb 2020 04:38 PM IST
अमर उजाला ब्यूरो अमर उजाला, करनाल(हरियाणा)
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प्रतीकात्मक तस्वीर
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कैंसर का नाम सुनते ही रूह कांप जाती है और मौत सामने नजर आने लगती है, लेकिन ऐसे लोगों की भी कमी नहीं है, जिन्होंने हिम्मत और जज्बे से कैंसर को मात दी है। बात हो रही है दुर्गा कालोनी निवासी परविंद्र कौर की। परविंदर कौर ने न केवल इस बीमारी से लड़ते हुए अपनी पढ़ाई जारी रखी, बल्कि खुद को स्थापित भी किया। आज परविंदर कौर एक स्कूल में अध्यापक हैं और बच्चों को शिक्षा दे रही हैं। परविंदर को वर्ष 2015 में गले का कैंसर हो गया। इस समय उन्होंने 12वीं में दाखिला लिया ही था। उनके गले में गांठ बनी रहती थी।
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डॉ. से टेस्ट करवाने के बाद उन्हें कहा गया कि टीबी है। छह महीनों तक टीबी समझ कर इलाज करवाती रहीं। इसके बाद गले की गांठ बढ़ती रही और खाना-पीना भी मुश्किल हो गया। ज्यादा दिक्कत होने पर उन्होंने दिल्ली के बीएल कपूर अस्पताल में चेकअप कराया तो पता चला कि उन्हें गले का कैंसर है जो कि आखिरी स्टेज पर पहुंच चुका है। दिल्ली में आठ महीनों तक इलाज चला। गले में कैंसर ऐसी जगह पर था, जहां ऑपरेशन नहीं किया जा सकता था। इस सफर में उन्हें काफी गंभीर समस्याओं से जूझना पड़ा।

आठ महीने चिकित्सा के दौरान परविंदर ने पाइप के जरिए ही भोजन लिया। कैंसर के ट्रीटमेंट में उन्हें आठ बार कीमोथेरेपी दी गई और 40 बार रेडिएशन दिया गया। इसके बावजूद परविंदर विचलित नहीं हुईं। उन्होंने कहा कि जब-तक हम खुद किसी चीज से लड़ने की हिम्मत नहीं रखते तब तक उससे जीत नहीं सकते। इसी दृढ़ हौसले से उन्होंने कैंसर को मात दी और आज सभी के लिए प्रेरणा बनीं। परविंदर कौर ने बताया कि पहले वह भी कैंसर के नाम से डर गई थीं, लेकिन हर बार मां ने उन्हें हौसला दिया, परविंदर का कहना है कि कैंसर से बचने के लिए जीने का जज्बा होना चाहिए।
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सभी कैंसरों में ये लक्षण सामान्य रूप से होते हैं अनुभव

पैथोलॉजिस्ट डा. अनीता का कहना है कि अत्यधिक थकान, बेवजह वजन घटना, ज्यादा दस्त या खून, भूख और वजन घटना लीवर कैंसर के लक्षण हैं, लंबे बुखार के अलावा कोई फोड़ा या गांठ। ज्यादातर लोग कैंसर के शुरूआती संकेतों व लक्षणों को नजरअंदाज कर देते हैं।

जैसे स्तनों में बदलाव, खून की उल्टी, खांसी, दर्द, पेट फूलना, तिल-मस्सा के रंग और आकार या त्वचा का काला पड़ना, मुंह के अंदर या जीभ पर सफेद पैच, कफ और सीने में दर्द, पीरियड्स में तकलीफ। कुछ भी सामान्य से अलग लगे तो अपने डॉ. से मिलें और आवश्यक जांच कराएं। कैंसर का जितनी जल्दी पता लगेगा उससे लड़ना उतना ही आसान होगा।
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महिलाओं को सबसे ज्यादा खतरा सरवाइकल कैंसर का

स्त्री रोग विशेषज्ञ डॉ. मीनू ठाकुर ने कहा कि हमारे देश में महिलाओं में सबसे ज्यादा जिस कैंसर से मौत होती है वो है सरवाइकल कैंसर। इसको पनपने में 10 साल लगते हैं। सरवाइकल कैंसर का कारण मानव पेपीलोमा नामक वायरस है। जब भी एक लड़की किशोर अवस्था में कदम रखती है तो उसे एचपीवी संक्रमण का जोखिम हो जाता है, लेकिन अगर सही तरीके से जांच की जाए तो ये पूरी तरह से खत्म किया जा सकता है। इसका एक पैप्समेयर टेस्ट है। 9 से 14 साल तक की लड़कियों को टीकाकरण करवाने से इसकी रोकथाम की जा सकती हैं, इसकी दो डोस दी जाती है।

9 से 14 वर्ष का समय शरीर के ग्रोथ का काफी अच्छा समय होता है, इसलिए इस आयु में टीकाकरण करवाने से अच्छा परिणाम मिलता है। ये टीकाकरण करवा लेने से लड़कियों को जीवन में लंबे समय तक सुरक्षा मिलती है। यदि यह टेस्ट 15 साल की उम्र के बाद करवाया जाए तो इसकी तीन डोस देनी पड़ती हैं। सरवाइकल कैंसर का टीकाकरण 9 से 45 साल तक कभी भी करवा सकते हैं। 10 साल में ये कैंसर पनप कर तैयार होता है, शुरूआती स्टेज पर अगर इसका पता लगा लिया जाए तो 100 प्रतिशत इसका इलाज संभव है।
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