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Karnal News: प्रवचन सुनकर श्रद्धालु निहाल, जयकारे लगाकर सतगुरु महाराज सहित राजपिता का स्वागत

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समागम में श्रद्धालुओं का मार्गदर्शन करते सतगुरु सुदीक्षा महाराज व राजपिता। संवाद
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नारायणगढ़ (अंबाला)। ब्रह्मज्ञान से ही जीवन में सहज अवस्था प्राप्त की जा सकती है और स्थिर निरंकार परमात्मा से जुड़कर ही जीवन में सुकून मिलता है। ये उद्गार निरंकारी सतगुरु माता सुदीक्षा महाराज ने रविवार को नई अनाज मंडी में निरंकारी संत समागम के दौरान कहे।
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सतगुरु ने कहा कि जिस प्रकार सूर्य अपनी रोशनी किसी विशेष को नहीं, बल्कि सबको देता है, उसी प्रकार प्रकृति भी किसी प्रकार का भेदभाव नहीं करती। इसी प्रकार हम इंसानों को भी जात-पात, ईर्ष्या और द्वेष से ऊपर उठकर सबसे प्रेम भाव और एकता से रहने का आह्वान किया। समागम में शाहबाद जोन के जोनल इंचार्ज सुरेंद्र पाल और स्थानीय मुखी उर्मिला वर्मा ने निरंकारी सतगुरु माता सुदीक्षा महाराज और निरंकारी राजपिता रमित का अभिनंदन किया। उन्होंने प्रशासन, पुलिस, नगर पालिका, मंडी एसोसिएशन और सभी विभागों की ओर से दिए सहयोग के लिए आभार जताया। इस दौरान माता सुदीक्षा महाराज और निरंकारी राजपिता रमित का आशीर्वाद प्राप्त करने के लिए हरियाणा सहित हिमाचल, चंडीगढ़ और पंजाब से सेकड़ों की संख्या में श्रद्धालु पहुंचे।
कलम से समझाया मानवता का महत्व
सतगुरु माजा ने एक उदाहरण देकर बताया कि एक कलम अगर विद्यार्थी के हाथ में है तो वो परीक्षा के काम आता है, अगर परिवार में है तो कई काम करता है। इसी प्रकार लेखक और कहानीकार के लिए कलम कल्पनाओं के आधार पर लेखन के कार्य में काम आता है। कलम किसी प्रकार का भेदभाव या फर्क नहीं करती। इसी प्रकार मनुष्य को भी मानवता को नहीं छोड़ना चाहिए।
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आग के अलग-अलग स्वरूप
सतगुरु ने कहा कि प्रत्येक परिस्थिति में एक सा रहना केवल तभी संभव है, जब हम स्थिर परमात्मा से नाता जोड़ें। स्थिर से जुड़कर जीवन सुकून और आनंद वाला होता है। आग का उदाहरण देते हुए कहा कि जिस प्रकार आग का काम जलाना है। परंतु आग जलाकर अगर तवा रख दिया जाए तो उस पर चपाती बनती है। ब्रह्मज्ञान से अपने क्रोध और अहंकार पर नियंत्रण करके व्यक्ति अपने भावों को दया, करुणा से युक्त कर सकता है। मनमति को छोड़कर संतमति को अपनाता है। किसी को नुकसान देने का भाव न रखकर दूसरों को सहयोग देने की भावना वाला जीवन बन जाता है।

धर्म जोड़ता है, तोड़ता नहीं
निरंकारी राजपिता रमित ने बाबा हरदेव सिंह के कथन, धर्म जोड़ता है, तोड़ता नहीं पर कहा कि धर्म ने सदैव जोड़ने का काम किया है। केवल स्वयं की मान्यताएं, अंधकार और भ्रांतियां ही धर्म को तोड़ने का कारण बनती हैं। ब्रह्मज्ञान के बाद जब एकता का एहसास होता है तो फिर नफरत, वैर-विरोध की दीवारें पैदा ही नहीं होती। नारायणगढ़ का जिक्र करते हुए कहा कि जिस मानव के जीवन में ब्रह्मज्ञान और प्रेम आ जाता है वह स्वयं ही नारायण के घर का बनता चला जाता है।

समागम में श्रद्धालुओं का मार्गदर्शन करते सतगुरु सुदीक्षा महाराज व राजपिता। संवाद

समागम में श्रद्धालुओं का मार्गदर्शन करते सतगुरु सुदीक्षा महाराज व राजपिता। संवाद

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