घरौंडा। धान की फसल को पत्ता लपेट बीमारी ने चपेट में लेना शुरू कर दिया है। इससे किसानों की चिंताएं बढ़नी शुरू हो गई हैं। किसान इस बीमारी को खत्म करने के लिए अंधाधुंध पेस्टीसाइड दवाइयों का प्रयोग कर रहे हैं। इससे पर्यावरण के साथ-साथ आम जीवन पर भी प्रभाव पड़ने की संभावनाएं नजर आ रही हैं। धान में बीमारी बढ़ने के कारण किसानों ने अपना रुख मक्का की फसल उगाने की ओर कर लिया है और इस वर्ष किसानों ने सैकड़ों एकड़ भूमि पर मक्का की फसल लगाई गई है। कृषि विशेषज्ञों का मानना है कि फसलों में जैविक खाद का भी प्रयोग करना चाहिए। खेतों में धान की रोपाई का कार्य पूरे जोरशोर से चल रहा है। घरौंडा व आसपास के क्षेत्र के किसानाें ने 95 प्रतिशत धान की रोपाई कर दी है। अभी तक रोपाई का कार्य पूरा भी नहीं हुआ कि पत्ता लपेट बीमारी ने किसानों की फसल को अपनी चपेट में लेना शुरू कर दिया है। इस कारण किसानों के माथे पर चिंता की लकीरें दिखाई देने लगी है। किसानों ने इस बीमारी से छुटकारा पाने के लिए अपने खेतों में अंधाधुंध पेस्टीसाइड दवाइयों का छिड़काव शुरू कर दिया है। इससे फसलाें के साथ-साथ वातावरण व आम व्यक्ति के जीवन पर भी इसका असर पड़ रहा है। अंधाधुंध पेस्टीसाइड के इस्तेमाल को रोकने के लिए विशेषज्ञ जैविक खाद से खेती तैयार करने के लिए लोगों को प्रेरित कर रहे हैं। खंड विकास अधिकारी राजेंद्र सिंह के अनुसार भूजल संरक्षण को देखते हुए सरकार ने किसानों को धान के साथ-साथ मक्का की खेती करने के लिए प्रेरित किया है। इसके लिए सरकार किसानों को 20 हजार रुपये तक अनुदान दे रही है। इसके चलते इस वर्ष घरौंडा व आसपास के क्षेत्र में 28 हजार हेक्टेयर में धान की रोपाई का लक्ष्य रखा गया है। इसके साथ ही 400 हेक्टेयर भूमि में मक्का बिजाई करने की मुहिम तेज की गई है ताकि फसल विविधीकरण को बढ़ावा देते हुए भूजल संरक्षण किया जा सके। लक्ष्य के अनुरूप अब तब 95 प्रतिशत में धान की रोपाई हो चुकी है। किसान राजेश व राममेहर का कहना है कि बासमती धान की रोपाई का दौर चल रहा है। अगेती फसलें जिनमें फुटाव व बढ़वार चल रही है। धान की फसल में खेतों में पत्ता लपेट कीट बीमारी पांव फैला चुकी है, जिसके कारण किसानों की फसल बर्बाद होने के कगार पर है। खेतों में स्प्रे करवाने के बाद भी इस बीमारी पर नियंत्रण नहीं है। कई किसान बार-बार दवा का छिड़काव करवा रहे हैं। यह कीट पौधे का रस चूस लेती है और पत्ता खराब होने लगता है। इस बीमारी के कारण 25 से 30 प्रतिशत तक उत्पादन कम होगा। सीरियल सिस्टमस इनिशिएटिव फॉर साउथ एशिया परियोजना के हरियाणा हब समन्वयक डॉ. बीआर कंबोज ने बताया कि बरसात के कुछ समय बाद मौसम में नमी रहने व सूखा रहने की स्थिति में धान में पत्ता लपेट कीट का असर होता है और घरौंडा उसके आसपास के क्षेत्रों में यह देखने को मिल रहा है, जिन खेतों में रोपाई की है, उनमें ही यह असर है। पत्तों में जितना कालापन व नरम होगा, उसमें कीट का प्रकोप होने की संभावना रहेगी। यह एक तरह का कीड़ा है, जो धान के पत्ते को अपना भोजन बनाता है उसके बाद यह पत्ता सूखना शुरू हो जाता है, किसान या तो जिस खेत में इसका असर दिखाई दे, उस खेत में पौधे को तिले या अन्य किसी चीज से पत्ते को झाड़ दे ताकि वह कीड़ा जमीन पर गिर जाये या फिर लपेट के नियंत्रण के लिए मोनोक्त्रसेटोफास दवा 250 एमएल प्रति एकड़ में छिड़काव करें। खेत में जहां तक हो सके यूरिया खाद का प्रयोग कम करें।