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बदल सकता है कैथल में चार गुरुद्वारों का प्रबंधन

Tue, 08 Jul 2014 12:07 AM IST
ब्यूरो/अमर उजाला, कैथ्ाल
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कैथल। हरियाणा में अलग सिख गुरुद्वारा प्रबंधक कमेटी के गठन के बाद जिले के चार ऐतिहासिक गुरुद्वारों की देखरेख की प्रक्रिया में तब्दीली आ सकती है।
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ये चारों ऐतिहासिक गुरुद्वारे इस समय शिरोमणि गुरुद्वारा प्रबंधक कमेटी की देखरेख में चल रहे हैं, लेकिन हरियाणा सिख गुरुद्वारा प्रबंधक कमेटी का गठन होने के बाद इन गुरुद्वारों का प्रबंधन एचएसजीपीसी कर सकती है। इस समय इन गुरुद्वारों में कोई भी फैसला लेने से पूर्व एसजीपीसी अमृतसर से अनुमति लेनी पड़ती है।

जिले में इस समय कैथल का गुरुद्वारा नीम साहिब, गुरुद्वारा मंजी साहिब एवं गुहला-चीका में 6वीं एवं 9वीं पातशाही ऐतिहासिक गुरुद्वारा और 9वीं पातशाही गुरुद्वारा साहिब गढ़ी नजीर एसजीपीसी के नियंत्रण में आता है।  कैथल के दोनों गुरुद्वारों के प्रबंधन के लिए स्थानीय कमेटी का चयन किया गया है, जो आठ सालों से लगातार गुरुद्वारों की देखरेख कर रही है। वहीं गढ़ी नजीर में भी स्थानीय कमेटी एसजीपीसी के अनुसार गुरुद्वारों का संचालन कर रही है, लेकिन चीका के 6वीं व 9वीं पातशाही गुरुद्वारे का प्रबंधन सीधा एसजीपीसी के नियंत्रण में है।
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कैथल में गुरुद्वारा नीमसाहिब एवं गुरुद्वारा मंजी साहिब स्थानीय प्रबंध कमेटी के अध्यक्ष सरदार सुरजीत सिंह एडवोकेट ने बताया कि कैथल के दोनों गुरुद्वारों के प्रबंधन के लिए स्थानीय कमेटी का चयन 8 साल पहले हुआ था। जो लगातार एसजीपीसी के निर्देशानुसार इनका प्रबंधन देख रही है। उन्होंने बताया कि इस समय गुरुद्वारे के संबंध में कोई भी फैसला लेना हो तो एसजीपीसी से अनुमति लेनी पड़ती है।

यहां खर्चों पर देखरेख के लिए प्री-ऑडिटर आते हैं। इसके अलावा यदि कोई निर्माण कार्य करना हो तो एसजीपीसी द्वारा इंजीनियर भेजकर एस्टीमेट बनाया जाता है। इसे स्थानीय कमेटी में प्रस्ताव के माध्यम से पारित कर एसजीपीसी अमृतसर को भेजा जाता है, वहां से मंजूरी के बाद निर्माण कार्य शुरू होता है। कुछ खरीददारी करनी हो तो भी एसजीपीसी द्वारा नियुक्त इंस्पेक्टर की मौजूदगी में की जाती है। इसके अलावा आमदनी का दसवां हिस्सा एसजीपीसी को दिया जाता है। स्थानीय कमेटी केवल लंगर को लेकर अपने आप फैसला ले सकती है। एचएसजीपीसी का गठन होने के बाद फैसले जल्दी होंगे तथा जल्दी कार्य होंगे।

वहीं जिले के एकमात्र दफा 85 के तहत आने वाले गुरुद्वारा 6वीं व 9वीं पातशाही चीका का प्रबंधन इस समय सीधा एसजीपीसी अमृतसर के नियंत्रण में है। जो बाद में एचएसजीपीसी के नियंत्रण में आ सकता है। साथ ही चीका क्षेत्र में ही पंजाब सीमा पर स्थित गुरुद्वारा साहिब गढ़ी नजीर 9वीं पातशाही भी एचएसजीपसी के नियंत्रण में है।

समृद्ध इतिहास है चारों गुरुघरों का
जिले में चीका में स्थित 6वीं व 9वीं पातशाही चलका गुरुद्वारा में 6वीं एवं 9वीं पातशाही दोनों ही पधारे थे। गुरुद्वारा के पूर्व प्रबंधक सरदार हरपाल सिंह ने बताया कि 17वीं शताब्दी में 6वीं पातशाही गुरु हरगोबिंद सिंह जी फिरोजपुर जिला के भाईजी डरौली में ठहरे हुए थे तो यूपी के नानकमता से आए श्रद्धालुओं ने बताया था कि वहां कुछ लोगों ने गुरु नानक देव जी के समय के पीपल को जला दिया है। उनकी इस सूचना पर गुरु हरगोबिंद सिंह जी ने वहां जाने का फैसला लिया था। वे नानकमता जाते समय यहां पधारे थे। इसके बाद दिल्ली जाते समय 9वीं पातशाही गुरु तेग बहादुर सिंह भी चीका एवं गढ़ी नजीर में पधारे थे।
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वहीं कैथल के गुरुद्वारों के बारे में जानकारी देते हुए सरदार सुरजीत सिंह एडवोकेट ने बताया कि औरंगजेब के आतंक की सूचना पाकर 9वीं पातशाही गुरु तेग बहादुर सिंह जी आनंदपुर साहब से चलकर दिल्ली के लिए निकले थे। वे 1675 में वहां जाते समय कैथल में अपने 5 सेवादारों भाई मतीदास, सतीदास, चेता, दयाला सहित 5 के साथ पधारे थे। जहां आज गुरुद्वारा नीमसाहिब है, यहां वे नीम के पेड़ के नीचे ठहरे थे। यहां एक बढ़ई ने उन्हें अपने घर खाने पर आमंत्रित किया था। उस बढ़ई का घर जहां गुरुद्वारा मंजीसाहिब है, वहां था। जहां गुरु जी पहुंचे थे। इसी कारण इन गुरुद्वारों का नाम नीमसाहिब एवं मंजी साहिब है।
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