कैथल। जिला उपभोक्ता आयोग ने वारंटी अवधि के दौरान खराब हुए रेफ्रिजरेटर की नि:शुल्क मरम्मत नहीं करने पर कंपनी को ठीक करने के आदेश दिए हैं। शिकायतकर्ता की असुविधा के लिए 5,000 रुपये मुआवजा देने के आदेश दिए हैं। आदेश के अनुपालन के लिए 45 दिन का समय निर्धारित किया गया है। तय अवधि में आदेश का पालन नहीं होने पर देय राशि पर सात प्रतिशत वार्षिक ब्याज देना होगा। साथ ही उपभोक्ता संरक्षण अधिनियम-2019 की धारा 72 के तहत आगे की कार्रवाई भी की जा सकेगी।
शिकायतकर्ता सुनील ने आयोग के समक्ष बताया कि उसने 18 अगस्त 2018 को एक रेफ्रिजरेटर खरीदा था। जून 2024 में उसका कंप्रेसर ठीक से काम करना बंद कर गया जिससे फ्रिज में पर्याप्त कूलिंग नहीं हो रही थी और बर्फ भी नहीं जम रही थी। समस्या आने पर उसने कई बार कंपनी से संपर्क किया लेकिन कोई समाधान नहीं हुआ। शिकायतकर्ता के अनुसार 29 जून 2024 को उसने कंपनी को ई-मेल भेजकर शिकायत पर कार्रवाई करने और किसी वरिष्ठ अधिकारी का संपर्क नंबर उपलब्ध कराने का अनुरोध किया था।
इसके जवाब में कंपनी ने उसका मोबाइल नंबर मांगा और बाद में अपनी प्रतिनिधि के माध्यम से ई-मेल भेजकर असुविधा के लिए खेद जताया। कंपनी ने फ्रिज की मरम्मत के लिए एक-दो दिन का समय भी मांगा लेकिन इसके बावजूद खराबी दूर नहीं की गई। वहीं कंपनी की ओर से आयोग में दलील दी गई कि तकनीकी निरीक्षण के दौरान पाया गया था कि कंप्रेसर और पीसीबी मॉड्यूल बदलने की आवश्यकता है। कंपनी का कहना था कि कंप्रेसर वारंटी में कवर था, जबकि पीसीबी मॉड्यूल के लिए उपभोक्ता को भुगतान करना था। आरोप लगाया गया कि शिकायतकर्ता ने भुगतान करने से इन्कार कर दिया और अनावश्यक मुकदमेबाजी शुरू कर दी।
हालांकि आयोग ने कंपनी के इस तर्क को स्वीकार नहीं किया। आयोग ने कहा कि कंपनी यह साबित करने के लिए कोई दस्तावेजी साक्ष्य प्रस्तुत नहीं कर सकी कि उसका तकनीशियन वास्तव में शिकायतकर्ता के घर गया था। न तो कोई निरीक्षण रिपोर्ट रिकॉर्ड पर पेश की गई और न ही संबंधित इंजीनियर का शपथ-पत्र दाखिल किया गया। ऐसे में कंपनी का दावा विश्वसनीय नहीं माना जा सकता।
आयोग ने अपने आदेश में स्पष्ट कहा कि रेफ्रिजरेटर वारंटी अवधि के दौरान खराब हुआ था और कंपनी उसकी खराबी दूर करने में असफल रही। इससे सेवा में कमी सिद्ध होती है।