संवाद न्यूज एजेंसी
कैथल। महर्षि वाल्मीकि संस्कृत विश्वविद्यालय के टीक परिसर में सोमवार को तीन दिवसीय मंदिर एवं तीर्थ प्रबंधन विषय पर कार्यशाला की शुरुआत की गई। इस मौके पर कुलपति प्रो. रमेश चंद्र भारद्वाज ने कहा कि सांस्कृतिक एकात्मता की दृष्टि से मंदिरों एवं तीर्थ स्थलों की भूमिका महत्वपूर्ण रही है। उन्होंने मंदिरों एवं तीर्थों में सामाजिक, धार्मिक एवं आध्यात्मिक उन्नति के लिए निरंतर लोग जाते रहते हैं। मंदिरों में पूजा पाठ के अतिरिक्त विशेष सेवा के कार्यक्रम भी चलाए जाते हैं।
उन्होंने कहा कि त्योहार विशेष के दिनों में भीड़ भी अत्यधिक होती है। हर साल कुरुक्षेत्र के 48 कोस के तीर्थ स्थलों पर लाखों की संख्या में तीर्थयात्री एवं श्रद्धालु धार्मिक और आध्यात्मिक यात्राएं करते हैं, जिसका इस क्षेत्र की अर्थव्यवस्था पर भी सीधा प्रभाव पड़ता है।
संस्कृत विश्वविद्यालय इस दिशा में अपने विद्यार्थियों को स्वरोजगार की दृष्टि से सक्षम बनाने के लिए कृतसंकल्प है। कहा कि मंदिरों एवं तीर्थों के प्रबंधन का विषय अकादमिक जगत के विद्वानों के बीच होना चर्चा में आना चाहिए। इसलिए महर्षि वाल्मीकि संस्कृत विश्वविद्यालय ने तीन दिवसीय कार्यशाला का आयोजन किया है।
कार्यक्रम में कुरुक्षेत्र विकास बोर्ड के अध्यक्ष मदन मोहन छाबड़ा ने बतौर मुख्य अतिथि शिरकत की वहीं विशिष्ट अतिथि विश्व हिंदू परिषद् के अखिल भारतीय मंदिर अर्चक पुरोहीत संपर्क प्रमुख अरुण रामकृष्ण नेटके रहे। कार्यशाला का बीज वक्तव्य कुरुक्षेत्र विश्वविद्यालय के दूरस्थ शिक्षा केंद्र की निदेशक प्रो. मंजुला चौधरी ने प्रस्तुत किया। मंदिरों एवं तीर्थों से संबंधित यह विशेष प्रकार की पहली ऐसी कार्यशाला है, जिसमें 48 कोस की कुरुक्षेत्र तीर्थ के प्रबंधन संबंधी विषयों को भी अकादमिक दृष्टि से प्रस्तुत किया।