कैथल। उत्तर प्रदेश के प्रयागराज में चल रहा महाकुंभ का मेला धार्मिक दृष्टिकोण से विश्व का सबसे बड़ा दिव्या और भव्य मेला है। इतना विशाल मेला आज तक न ही देखा गया तथा ने ही सुना गया। अनेकता में एकता भारत की विशेषता यहां पर देखने को मिलती है।
विभिन्न धर्म समाज में संस्कृतियों का मिश्रण यहां बखूबी देखा जा सकता है। सेवानिवृत अध्यापक संगीतज्ञ श्याम सुंदर गॉड ने बताया कि अलग-अलग प्रांतों के लोग यहां पहुंच रहे हैं। विदेशी पर्यटक भी बड़ी संख्या में आकर बड़े चाव और श्रद्धा का परिचय दे रहे हैं। मेले का आकर्षण शाही स्नान होता है मेले में विभिन्न तरह साधु संत, महंत, महामंडलेश्वर, शंकराचार्य, हाथी घोड़े पालकियों और अपने-अपने वाहनों पर जुलूस के रूप में मेले में पहुंचे हैं। अपनी मुद्राओं क्रियाकलापों से वातावरण को धार्मिक और आकर्षक बना रहे हैं।
बताया कि समुद्र मंथन के समय समुद्र से लक्ष्मी ऐरावत हाथी जैसे लगभग 15 रत्न निकले। भगवान धन्वंतरि अमृत के कुंभ के सहित समुद्र से निकले। जहां-जहां पर अमृत की बूंदे पड़ी उन स्थानों पर कुंभ लगा। प्रत्येक 12 वर्ष के बाद हरिद्वार, नासिक, उज्जैन व प्रयागराज में कुंभ का मेला लगता है। कुंभ का धार्मिक दृष्टि से बड़ा ही महत्व है। कार्तिक, माघ एवं वैशाख स्नान से कई गुना अधिक फल मिलता है। वृश्चिक राशि पर जब गुरु आता है तब माघ मास की अमावस को अर्ध कुंभ होता है। ऐसा ज्योतिषियों का विचार है। जैसा कि विदित है प्रयाग में गंगा जमुना एवं सरस्वती की तीन धाराएं आपस में मिलती हैं उसे स्थान को संगम कहते हैं। वैसे तो संगम में कभी भी स्नान किया जा सकता है परंतु कुंभ अर्ध कुंभ पर स्नान करना अधिक लाभदायक और पुण्य बताया गया है।
आस्था की डुबकी लगाने से शांति, अकाल मृत्यु से छुटकारा, शत्रु पर विजय और मोक्ष की प्राप्ति होती है ऐसा हिंदू ग्रंथों में लिखा है। श्याम सुंदर ने बताया कि समय ने काफी करवट ले ली है। पहले स्नान, ध्यान और साधुओं के दर्शनार्थ लोग धार्मिक मेलों में जाया करते थे। श्रद्धा भाव रखते थे लेकिन अब वह बात नहीं रही है। मौज मस्ती के लिए अधिकतर लोग धार्मिक स्थलों पर जा रहे हैं। इसका कारण पाश्चात्य सभ्यता का प्रभाव के कारण बदली हुई मानसिकता है।