कर्मचारी चयन आयोग द्वारा पुलिस भर्ती की परीक्षा में एक परीक्षार्थी को परीक्षा केंद्र अधीक्षक के हठ के आगे मजबूर होकर परीक्षा से बाहर रहना पड़ा। जबकि दौरे पर आए भर्ती बोर्ड के अधिकारी भी अधीक्षक को निर्देश दे गए कि उम्मीदवार की गलती नहीं हैं। उससे एप्लीकेशन लिखवाकर परीक्षा केंद्र में बैठा लीजिए।
पानीपत के जलमाना गांव निवासी अंकित रावल ने बताया कि जब फार्म भरा तो उसमें नाम सही था। बोर्ड से जो रोल नंबर आया उसमें उसका नाम पता बदला हुआ था। अंकित रावल पुत्र रामफल की बजाए मोहन लाल पुत्र कर्ण सिंह निवासी बापौली का दे दिया। जिसे ठीक करवाने के लिए वह बोर्ड के पंचकुला स्थित कार्यालय में गया। वहां उसे कह दिया गया कि इसे ठीक कर दिया जाएगा। रविवार को वह अपना ऑनलाइन भरे गए फार्म का प्रिंट व रोल नंबर की प्रतियां लेकर पहुंचा तो परीक्षा केंद्र में ही बैठने नहीं दिया गया। उसे इधर-उधर चक्कर कटवाते रहे। बाद में बोर्ड के अधिकारी आए।
बोर्ड के अधिकारियों को समस्या बताई। इन अधिकारियों ने शिकायत के बारे में एप्लीकेशन लिखकर परीक्षा केंद्र में बैठने की अनुमति दे दी और वहां से चले गए। इसके बाद जब वह एप्लीकेशन लिखकर फिर परीक्षा केंद्र में गया तो परीक्षा केंद्र पर तैनात सुपरीटेंडेंट व अन्य अधिकारियों ने परीक्षा में बैठने नहीं दिया और कहा कि जिन बोर्ड के अधिकारियों ने मौखिक अनुमति दी थी, उनसे एप्लीकेशन पर हस्ताक्षर करवाकर लाओ। अब अंकित के लिए यह समस्या खड़ी हो गई कि वह उन अधिकारियों को कहां से ढूंढे। इसी बीच परीक्षा का समय पूरा हो गया। जिस कारण एक होनहार युवा जिसने अपनी शारीरिक परीक्षा एक्सीलेंट लेकर पास की थी। उसने फिजिकल की परीक्षा 19 मिनट में पास कर दी। परीक्षा केंद्र के अधिकारियों की वजह से वह भर्ती से एक तरह से वंचित रह गया।
बेशक बाद में कोर्ट, सरकार, अधिकारियों के चक्कर लगें, दोषी कर्मचारियों के खिलाफ कार्रवाई हो भी जाए? लेकिन इस बात से कौन इंकार कर सकता है कि एक होनहार युवा को इन अधिकारियों की हठधर्मिता के कारण पुलिस भर्ती से वंचित होना पड़ा। क्या पता अंकित परीक्षा में अव्वल आकर इस भर्ती में सबसे आगे रहता?